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Monday, 26 March 2018

लेख क्रमांक :- 17 (Word Count - 392)

सुप्रीम कोर्ट द्वारा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को फटकारने के बावजूद आधार कार्ड पर संदेह की राजनीति गहराती जा रही है। भाजपा नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी ने आधार को तबाही वाली योजना बताते हुए भारत के विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को ही खत्म करने की सलाह देकर इस योजना की कमजोरियों की ओर व्यापक रूप से ध्यान आकर्षित किया है। स्वामी ने याद दिलाया है कि 2014 के चुनाव में जब मौजूदा केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार आधार योजना के जनक नंदन नीलेकणी के विरुद्ध बेंगलुरू दक्षिण से चुनाव लड़ रहे थे, तब वहां पर आधार कार्ड एक मुद्‌दा बना था। स्वामी ने चार भाषणों के माध्यम से नीलेकणी को रक्षात्मक मुद्रा में ला दिया था और अनंत कुमार विजयी हुए थे। इसके बावजूद अगर एनडीए सरकार ने आधार अधिनियम पारित करके इसे समाज कल्याण की योजनाओं से ही नहीं लोगों के बैंक खातों और फोन नंबरों से जोड़ना अनिवार्य कर दिया है तो उसकी दलील भ्रष्टाचार रोकने और कालेधन को खत्म करने की है। यूपीए सरकार की यह योजना अगर एनडीए सरकार ने अपनाई है तो इसमें कोई सार जरूर है। दूसरी ओर अगर इस योजना पर मानवाधिकार संगठनों और जागरूक नागरिकों को संदेह है और आम जनता को कई प्रकार की परेशानियां हो रही हैं तो सरकार को उस पर गौर करना ही होगा। हाल में झारखंड में भूख से होने वाली मौतों का कारण भी आधार कार्ड से लिंक न बन पाने में देखा जा रहा है। उस परिवार का राशन आधार के कारण बंद हो गया। आधार के साथ दूसरी बड़ी दिक्कत बायोमेट्रिक्स के निशान के बदल जाने और कई बार पहचान न हो पाने की भी है पर उससे भी गंभीर समस्या आंकड़ों और पहचान के चोरी होने और सरकार की निगरानी के मोर्चे पर है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने अपने सर्वाधिक महत्वपूर्ण फैसले में निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना है। ऐसे में आधार अनिवार्य बनाए जाने पर और सवाल उठने लगे हैं। स्वामी ने कहा भी है कि सरकार को देर-सबेर इसे खत्म ही करना होगा। हालांकि, आधार के विरुद्ध कोई राजनीतिक आंदोलन नहीं है और उसका विरोध ममता बनर्जी जैसी इक्का-दुक्का राजनेता ही कर रही हैं, फिर भी नागरिक संगठनों और स्वतंत्र नागरिकों ने बहुत सारी याचिकाओं के माध्यम से इसे रद्‌द किए जाने की मांग की है। देखना है संदेह में घिरते इस लोकतंत्र में सुप्रीम कोर्ट कैसे यकीन पैदा करता है।

Saturday, 17 March 2018

लेख क्रमांक :- 16 (Word Count - 394)


चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के महासम्मेलन में स्वीकृत हुए वन बेल्ट वन रोड (ओबीओआर) के प्रस्ताव के जवाब में जापान की पहल पर भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की युति से दुनिया के शक्ति संतुलन का नया मानचित्र बनने की संभावना बढ़ गई है। जापानी विदेश मंत्री तारो कोनो के बयान से लग रहा है कि इसका स्वरूप चीन की योजना के विकल्प के तौर पर होगा और इसमें दुनिया के अन्य देशों को जोड़ा जाएगा। चीन की विस्तारवादी नीति से भारत, जापान, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे अहम देश तो चिंतित हैं ही एशिया और अफ्रीका के अन्य देश भी बेचैन हैं पर वे जाएं तो जाएं कहां। पहले से चर्चा में रही इस योजना को जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे दोबारा सत्ता में आने के बाद ठोस रूप देने को उत्सुक हैं। इस पर तारो कानो ने ऑस्ट्रेलियाई विदेश मंत्री जूली बिशप और अमेरिकी विदेश मंत्री रैक्स टिलरसन से अगस्त में ही बात की थी। इस बीच भारत के दौरे पर आए टिलरसन ने दक्षिण एशिया में सड़क और बंदरगाह बनाने पर जोर दिया ताकि एशिया और प्रशांत क्षेत्र की व्यापारिक और सामरिक नीति को नया आयाम दिया जा सके। शिंजो आबे और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की 6 नवंबर को होने वाली मुलाकात भी इस दिशा में खास हो सकती है। इस योजना के माध्यम से अमेरिका भारत की भूमिका को बढ़ाने को उत्सुक है। अमेरिका चाहता है उसके ऐसे रिश्ते बनें जो आने वाले सौ वर्षों तक कारगर हों। रिश्तों के इसी खाके में अफगानिस्तान में भारत की भूमिका बढ़ाने की भी बात है, जो अपने में सबसे आरंभिक पहल कही जा सकती है। इस दीर्घकालिक सामरिक योजना को अगर व्यापारिक योजना के तहत क्रियान्वित किया जाएगा तो दुनिया के दूसरे देश भी आकर्षित होंगे और विश्व समुदाय के नियमों को लागू करने में सुविधा होगी। यह सही है कि अमेरिका दुनिया के नियमों को अपने ढंग से हांकता है लेकिन, वह दुनिया को पटरी पर रखने की जिम्मेदारी भी उठाता है। जबकि चीन अपनी बढ़ती सामरिक और आर्थिक शक्ति के कारण नियमों को ताक पर रखकर अपनी दुनिया बनाना चाहता है। इसी कारण उसने साठ देशों को जोड़ने वाली ओबीओआर योजना तैयार की है और भारत ने सम्प्रभुता का सवाल उठाकर उसमें शामिल होने से मना कर रखा है। देखना है कि जापान की पहल वाली इस नई योजना का स्वरूप क्या होता है और भारत उसमें किस प्रकार शामिल होता है।

लेख क्रमांक :- 15 (Word Count - 352)


अर्थव्यवस्था की बिगड़ती सेहत सुधारने के लिए भारत सरकार ने दवाओं की बजाय टॉनिक देने का फैसला किया है, इसलिए उम्मीदों के बीच संदेह के सवाल भी उठने लगे हैं। मंगलवार को जैसे ही केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के लिए अगले दो सालों में 2.11 खरब रुपए की पूंजी जुटाने का फैसला किया वैसे ही अगले दिन शेयर बाजार में बैंकों के शेयर उछलने लगे। भारतीय स्टेट बैंक के शेयर में जनवरी 2015 के बाद पहली बार 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई और एनएसई में 1.3 प्रतिशत का उछाल दर्ज किया गया। उधर सड़क निर्माण के काम में सात खरब रुपए निवेश के एलान के साथ भी चौतरफा उत्साह दिखाई दिया। वित्त मंत्री ने उन आलोचनाओं का भी जवाब देने का प्रयास किया है, जो पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा और पूर्व विनिवेश मंत्री अरुण शौरी से शुरू होकर थामस पिकेटी के असमानता संबंधी आंकड़े और वैश्विक भूख सूचकांक में भारत के पतन संबंधी सर्वेक्षण के साथ सरकार को चारों तरफ से घेर रही थीं। गुजरात विधानसभा चुनाव के एलान के ठीक पहले लिए गए इस फैसले में एक राजनीतिक माहौल भी बनाने का प्रयास दिखाई पड़ता है। वजह साफ है कि गुजरात सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं है वह भाजपा के राजनीतिक और आर्थिक मॉडल की अग्निपरीक्षा है और इसमें मौजूदा सरकार को खरा उतरना है। अर्थव्यवस्था को सुधारने के लिए उठाए गए इन कदमों से बैकों की पूंजी बढ़ने और कर्जलिए जाने में तेजी आने की उम्मीद है। स्थितियों के ठीक रहने की उम्मीद के साथ संदेह के सवाल भी जुड़े होते हैं। वैश्विक रेटिंग एजेंसी फ्लिच का कहना है कि भारतीय बैंकों को 2019 तक 65 अरब डॉलर पूंजी की जरूरत है, जबकि मौजूदा पूंजी उसकी आधी है। सरकार के एलान में इस पूंजी के जुटाए जाने का खाका भी स्पष्ट नहीं है। इसके अलावा कर्ज के बाजार में होने वाली बढ़ोतरी के साथ वित्तीय घाटे को जीडीपी के 3.6 प्रतिशत तक रखने की चुनौती भी पेश होगी। इस कदम की कामयाबी के समक्ष बट्टे खाते का कर्ज और रुकी हुई परियोजनाएं सबसे बड़ी बाधा हैं अब देखना है सरकार उन्हें कैसे दूर करती है।

Friday, 16 March 2018

लेख क्रमांक :- 14 (Word Count - 380)


केंद्र ने कश्मीर में अमन की बहाली के लिए खुफिया विभाग के पूर्व प्रमुख दिनेश्वर शर्मा को मुख्य वार्ताकार नियुक्त कर सही दिशा में सकारात्मक कदम उठाया है। इसकी काफी दिनों से मांग चल रही थी और मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती बार-बार प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से मिल भी रही थीं। भाजपा के असंतुष्ट नेता यशवंत सिन्हा और कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर इस दिशा में लंबे समय से प्रयास कर रहे थे। संभव है कि उन अलगाववादियों से भी अनौपचारिक वार्ता की गई हो, जो अक्सर आज़ादी से कम पर किसी वार्ता के लिए राजी नहीं होते। इसका संकेत तो तभी मिल गया था जब स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एलान किया था कि कश्मीर समस्या का समाधान न गाली से होगा और न ही गोली से, बात बनेगी तो गले लगाने से। उनका यह एलान देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के उस एलान के अनुरूप ही है कि कश्मीर पर संविधान नहीं इंसानियत के दायरे में बात होनी चाहिए। वाजपेयी ने श्रीनगर में इंसानियत और जम्हूरियत के साथ कश्मीरियत के दायरे में वार्ता करने का प्रस्ताव रखकर सभी का मन मोह लिया था और यासीन मलिक और शब्बीर शाह जैसे अलगाववादी नेता भी उनकी प्रशंसा करने लगे थे। लेकिन, अलगाववादी नेताओं के अड़ियल रवैए और वाजपेयी के फिर सत्ता में न आने से वह सिलसिला टूट गया था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी 2006 और 2007 में उसी तर्ज पर कश्मीर में तीन गोलमेज सम्मेलन कराए लेकिन, उनका नतीजा भी सिफर रहा। उस समय के वार्ताकार दिलीप पाडगांवकर और राधाकुमार ने कई समाधानों के साथ विस्तृत रपट भी दी थी, जिसका इस्तेमाल दिनेश्वर शर्मा भी कर सकते हैं। इसलिए देखना है कि अलगाववादियों से निपटने में माहिर कहे जाने वाले वार्ताकार शर्मा किन पक्षों को बातचीत की मेज तक ला पाते हैं। फारूक अब्दुल्ला की इस बात को भी नज़रंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि समाधान के लिए पाकिस्तान से भी बात होनी चाहिए। हालांकि, सवाल यह है कि पाकिस्तान प्रधानमंत्री शाहिद खकन अब्बासी की सरकार से होने वाली किसी वार्ता का वजन कितना होगा? निश्चित तौर पर सरकार की यह पहल बदली हुई नीति का परिणाम है, क्योंकि उसे लग गया है कि सुरक्षा बलों की सख्ती और नोटबंदी के मार्ग की सीमा आ चुकी है और आगे संवाद का ही मार्ग जाता है।

लेख क्रमांक :- 13 (Word Count - 395)


सुप्रीम कोर्ट ने 18 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ यौन संबंध को दुष्कर्म करार देकर बाल अधिकारों के बारे में समाज और सरकार को कड़ा संदेश दिया है और बेटी बचाओ की दिशा में एक साहसिक कदम उठाया है। बाल विवाह रोकने और अवयस्क लड़कियों के स्वास्थ्य, भविष्य और सम्मान की रक्षा के लिए दिया गया यह फैसला न सिर्फ कानूनी लिहाज से दूरदर्शी है बल्कि सामाजिक लिहाज से बड़ी हलचल पैदा करने वाला है। न्यायमूर्ति मदान बी लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता ने भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के उस अपवाद को रद्द कर दिया है जो पत्नी की उम्र 15 वर्ष या उससे ऊपर होने पर यौन संबंध को दुष्कर्म नहीं मानता था। आईपीसी की बेहद चर्चित धारा का यह अपवाद 15 से 18 वर्ष की बाल पत्नियों को पति की मर्जी पर छोड़ देता था और उन कानूनों की परवाह नहीं करता था जो बाल अधिकारों की रक्षा के लिए बनाए गए हैं। विडंबना देखिए कि ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ अभियान चलाने वाली सरकार इस मामले पर सुनवाई के दौरान अदालत में यह दलील दे रही थी कि न्यायालय भारतीय दंड संहिता के इस अपवाद को न छेड़े, क्योंकि बाल विवाह भारतीय परम्परा का हिस्सा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने उसे कड़ी फटकार लगाते हुए कहा है कि ऐसे वह बाल विवाह को वैधानिकता प्रदान कर रही है। सरकार की आपत्ति पर अदालत का कहना था कि वह किसी प्रावधान को खारिज करने के बजाय संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 21 के मौलिक अधिकार बेटियों को दे रही है और बाल अपराधों को रोकने के लिए बनाए गए बच्चों से यौन अपराध रोकने वाले पोस्को, बाल विवाह रोकने वाले पीसीएमए और हाल में संशोधित बाल अपराध न्याय अधिनियम को सुसंगत तरीके से लागू कर रही है। फैसले से परम्परा की आड़ में होने वाले बाल विवाह तो रुकेंगे ही, देह व्यापार के कारोबार पर भी लगाम लगेगी जो विवाह की आड़ में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होता है। वे दंपती भी साथ रहने से बचेंगे जो बालिग नहीं हैं। कई कानूनों के बावजूद कुछ वर्षों पहले किए गए राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के अनुसार 18 से 29 वर्ष की स्त्रियों में 46 प्रतिशत ऐसी हैं, जिनका विवाह 18 साल से पहले हो चुका था। यह समाज की बड़ी बुराई है लेकिन, इस बारे में विधायिका और कार्यपालिका के बजाय न्यायपालिका को पहल करनी पड़ती है।

Friday, 9 March 2018

लेख क्रमांक :- 12 (Word Count - 380)


भारत ने संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के मंचों पर कश्मीर मुद्‌दे को उठाने के पाकिस्तानी प्रयासों का मुंहतोड़ जवाब देकर दुनिया को उसकी हकीकत याद दिलाने का जो प्रयास किया है वह भारत ही नहीं दुनिया के भी हित में है। हालांकि, भारत ने जिनेवा में हो रहे संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 36वें सम्मेलन में अपनी तरफ से कोई मसला नहीं उठाया है बल्कि पाकिस्तान के आरोपों का जवाब दिया है। ऐसे आरोप पाकिस्तान ने इस्लामी देशों के संगठन के माध्यम से पिछले हफ्ते संयुक्त राष्ट्र के न्यूयॉर्क कार्यालय में भी लगाए थे और उसका भी उचित जवाब दे दिया गया है। उम्मीद है कि 23 सितंबर को जब विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र की महासभा में भाषण देंगी तब वे पाकिस्तान की उन खतरनाक प्रवृत्तियों को उजागर करेंगी, जिससे दुनिया को सतर्क रहने की जरूरत है। इसके संकेत उन्होंने अमेरिकी विदेश मंत्री रेक्स टिलरसन और जापानी विदेश मंत्री तारो कोनो के साथ वार्ता के बाद अपनी इस टिप्पणी के साथ दे भी दिया है कि उत्तर कोरिया की परमाणु प्रसार गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। पाकिस्तान का यह प्रयास उस खीझ को मिटाने की कोशिश है जो उसे हाल में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के भाषण और ब्रिक्स सम्मेलन के घोषणा-पत्र के माध्यम से मिली है। इन दोनों बयानों में उसे आतंकी संगठनों की शरणस्थली बताया गया है। ऐसे में भारत ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री ख्वाजा मोहम्मद आसिफ के उस बयान का हवाला देकर उचित ही किया है कि पाकिस्तान को लश्कर-ए-तय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठनों पर रोक लगानी ही होगी। भारत के लिए पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में पाकिस्तानी शासकों और सैनिक अधिकारियों के कारनामों को उजागर करना जरूरी है। हालांकि अमेरिका समेत दुनिया के कई देशों और मंचों से पाकिस्तान को यह सीख दी गई है कि वह भारत के साथ अपने विवादों को दोतरफा मसला बनाकर निपटाए। लेकिन पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता इस मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। बेहतर हो पाकिस्तान दुनिया के संगठनों और मित्र देशों से यह मांग करे कि वे उसके देश को राजनीतिक रूप से स्थिर करने में मदद करें ताकि वह अपनी समस्याओं को हल कर सके और पड़ोसियों के साथ अमन के साथ रह सके। इसलिए भारत को पाकिस्तान के आरोपों का जवाब देने के साथ उसके प्रति इस रुख की भी मांग रखनी चाहिए।

Thursday, 8 March 2018

लेख क्रमांक :- 11 (Word Count - 386)


कांग्रेस उपाध्यक्ष और जल्दी ही अध्यक्ष बनने की तैयारी में लगे राहुल गांधी ने भगवान कृष्ण की नगरी कही जाने वाली द्वारका से गुजरात विधानसभा चुनाव का प्रचार करने का फैसला करके हिंदुओं का दिल छूने की कोशिश की है लेकिन, यह संदेश भाजपा के हिंदुत्व के जादू को कितना कम कर पाएगा कहना कठिन है। गुजरात में लगातार तीन कार्यकाल पूरा कर चुकी और उसी मॉडल का प्रचार करके दिल्ली तक पहुंची भाजपा अब चौथे कार्यकाल की तैयारी कर रही है तब कांग्रेस को इस मॉडल की तमाम कमियां दिख रही हैं। राहुल उसी पर ध्यान आकर्षित करके 2019 के लिए अपनी नई राजनीति की बिसात बिछाना चाहते हैं। वे यह कहकर अपने को सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा दिखाना चाहते हैं कि महाभारत के समय कौरवों को हराने के लिए पांडव कृष्ण का आशीर्वाद लेने गए थे और वे भी वैसा ही कर रहे हैं। लेकिन, उन्हें यह मालूम होना चाहिए कि लोकतंत्र में जनता ही कृष्ण होती है और क्या वह उनके साथ आने को तैयार है? कांग्रेस ने पिछले माह राज्यसभा चुनाव में देख लिया है कि उसके सामने भाजपा की केंद्रीय शक्ति और राज्य में निर्मित विविध छवियों के व्यूह को भेद पाना कितना कठिन है। अगर उस चुनाव में कांग्रेस के कद्‌दावर नेता और सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल चुनाव जीते हैं तो वह चुनाव आयोग की स्वायत्तता और तकनीकी बिंदुओं के आधार पर न कि कांग्रेस की सांगठनिक क्षमता के चलते। हालांकि, पटेल की जीत ने कांग्रेस का हौंसला बनाए रखा है और उसे किसानों, युवाओं के असंतोष और पाटीदार बिरादरी की नाराजगी को अपने पक्ष में करने का अवसर दिया है। वह आकर्षण 182 सीटों वाली विधानसभा में कांग्रेस को बहुमत दिला पाएगा, यह कह पाना कठिन है। भाजपा की तुलना में कांग्रेस का विभाजन कहीं ज्यादा है। अगर ऐसा न होता तो शंकर सिंह बाघेला के पार्टी छोड़ने के बावजूद राज्य अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी के समांतर चार कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की नौबत न आती। उधर भाजपा गुजरात मॉडल की कमियों को ढंकने के लिए उसमें नए-नए चांद-तारे जोड़ रही है। बुलेट ट्रेन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जन्मदिन के मौके पर सरदार सरोवर का उद्‌घाटन करके समृद्धि का मायावी स्वप्न दिखाया है। देखना है द्वारका से चुनाव शुरू करने वाले राहुल इस युद्ध में अर्जुन साबित होते हैं या अभिमन्यु।

लेख क्रमांक :- 10 (Word Count - 388)


पहले प्याज के दाम बढ़ने से हाहाकार मचा था और अब नासिक के आठ-नौ प्रमुख व्यापारियों पर आयकर के छापों से प्याज के थोक मूल्य 1400 रुपए क्विंटल से 900 रुपए होने पर किसानों में नाराजगी है। 35 प्रतिशत की यह गिरावट बैंक ब्याज दरों में कटौती का माहौल बना रही सरकार और बाहर भेजने के लिए लालायित निर्यातकों को फायदा देने वाली है तो किसानों और घरेलू व्यापारियों के लिए घाटा। नोटबंदी से परेशान किसान अच्छी कीमत मिलने का लंबे समय से इंतजार कर रहे थे और वह कीमत नहीं मिलेगी तो वे या तो प्याज रोकेंगे या सड़कों पर फेंकेंगे। इस खींचतान में प्याज की नई राजनीति शुरू होने की संभावना है, जिसकी एक झलक फरवरी माह में नासिक के निकाय चुनावों में एनसीपी और शिवसेना के साथ भाजपा की खींचतान में दिखी। प्याज की इस राजनीति में एक तरफ तो इसका अंतरराष्ट्रीय बाजार और निर्यातक हैं तो दूसरी तरफ घरेलू उत्पादक और बाजार के बीच तमाम तरह के बिचौलिए। अगस्त के महीने में जब प्याज के खुदरा दाम तीस से पचास रुपए किलो तक पहुंच गए तो कृषि मंत्रालय को चिंता हुई और उसने अपने अधिकारियों को प्याज के भंडार और आवक के बारे में पता करने का आदेश दिया। उसी के साथ आयकर के छापे के बाद जो नतीजा सामने आया है उससे निर्यातकों को लाभ होने की संभावना है। भारतीय बाजार में प्याज के दाम बढ़ने के साथ निर्यातकों को पाकिस्तान, चीन और मिस्र के निर्यातकों से मध्य एशिया और श्रीलंका को आपूर्ति में कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करनी पड़ रहा था। इधर सरकार के सामने थोक मूल्य सूचकांक में मुद्रास्फीति की चुनौती दरपेश थी, क्योंकि वह पिछले महीने के 1.9 प्रतिशत से बढ़कर 3.24 प्रतिशत तक आ गई है। इसमें पेट्रोल के दामों में बढ़ोतरी से चार गुना योगदान प्याज के दाम का बढ़ना बताया जा रहा है। इस साल गुजरात में प्याज का उत्पादन कम है तो कर्नाटक से भी ज्यादा आपूर्ति की उम्मीद नहीं है। दारोमदार मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र पर है लेकिन, यहां के किसान कीमत से संतुष्ट नहीं हैं, इसलिए आपूर्ति रोक सकते हैं। प्याज के उत्पादन, विपणन और इस्तेमाल की यह परत दर परत पहेली तभी सुलझ सकती है जब सरकार का हस्तक्षेप सभी के हितों को ध्यान में रखते हुए बाजार की विकृतियों को सुधारने के लिए हो, न कि बाजार में विकृति पैदा करने के लिए।

लेख क्रमांक :- 9 (Word Count - 378)


एशिया में चीन के उभार और अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के कारण बनी अनिश्चितता को देखते हुए भारत-जापान का तेजी से नज़दीक आना एक अनिवार्यता है। यह निकटता न सिर्फ भारत की आर्थिक तरक्की की रफ्तार बढ़ाएगी बल्कि जापान और भारत दोनों के लिए रणनीतिक सुरक्षा और चौकसी का आधार भी प्रदान करेगी। जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे अहमदाबाद से मुंबई तक जिस एक लाख करोड़ रुपए की बुलेट ट्रेन परियोजना का शिलान्यास करने आए हुए हैं वह भारत की यातायात व्यवस्था को जापान-चीन की दिशा में बदलने का सपना है। इसीलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उसे भारत के राष्ट्रवाद से जोड़कर 2022 यानी आज़ादी की 75वीं सालगिरह पर पूरा करने का लक्ष्य रखा है। हालांकि, पिछले कुछ दिनों से बढ़ते ट्रेन हादसों और बुलेट ट्रेन परियोजना पर आने वाले भारी खर्च को देखते हुए शिवसेना जैसी सहयोगी पार्टियों ने इसे अमीरों और पूंजीपतियों के हित वाली योजना बताया है। लेकिन, मामला सिर्फ बुलेट ट्रेन का नहीं भारत और जापान की आर्थिक तथा रणनीतिक साझेदारी का है। जब चीन वन बेल्ट वन रोड की परियोजना को तेजी से मूर्त रूप दे रहा हो और डोकलाम में लंबे तनाव के बाद लौटी शांति के स्थायी होने की कोई गारंटी न हो तब भारत को एशिया में अपना नया दोस्त ढूंढ़ना जरूरी था। चीन ने अपने और अमेरिका के बीच अंतर को काफी कम कर दिया है और एशिया में जापान को पीछे करके पहले नंबर की आर्थिक ताकत बन गया है। आज अगर भारत और जापान का रक्षा बजट क्रमशः 56 और 46 अरब डॉलर है तो चीनी रक्षा बजट 216 अरब डॉलर का है। यह स्थिति चीन को ऐसी ताकत देती है कि वह कभी भारत को दबाता है तो कभी जापान को। साथ में अमेरिका से भी यह सौदेबाजी कर रहा है कि वह एशिया में हस्तक्षेप करके जो शक्ति संतुलन बनाता था उसे घटाए और चीन को एशिया का चौधरी बनकर अपने साथ वैश्विक सत्ता के शीर्ष पर स्थापित होने दे। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी-आबे के बहाने भारत-जापान की यह मैत्री स्वागत योग्य है। अच्छा होता मोदी इस पूरे आयोजन को गुजरात तक सीमित रखने की बजाय अखिल भारतीय स्वरूप देते। तब कांग्रेस पार्टी को यह कहने का मौका न मिलता कि उनकी निगाह नवंबर-दिसंबर में होने वाले गुजरात चुनाव पर भी है।

लेख क्रमांक :- 8 (Word Count - 375)


भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने कश्मीर में बाहरी लोगों के जमीन खरीदने और बसने को रोकने वाले संविधान के अनुच्छेद 35-ए को बरकरार रखने के बारे में आश्वासन देकर वहां के गरमाते राजनीतिक माहौल को ठंडा करने का जो प्रयास किया है वह सराहनीय है। लेकिन, सरकार को इस आश्वासन को पुख्ता करने के लिए नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला के सुझाव के मुताबिक अदालत में जवाबी हलफनामा देकर पूरा पक्ष रख देना चाहिए। सरकार के इस प्रयास से एक नए उभरते मुद्‌दे की हवा निकालने में सुविधा होगी। दरअसल, यह सरकार उस पार्टी की है जिसके नेता लगातार कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को खत्म करने की मांग करते रहे हैं । ऐसे में जब राजनाथ सिंह कहते हैं कि वे कश्मीर में खुले दिल से आए हैं तो उनकी बात पर दूसरे पक्ष को पूरा भरोसा नहीं होता। यहां तक कि पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती के मन में भी संदेह होता है और वे सफाई लेने दिल्ली तक दौड़ी चली आती हैं। लेकिन भाजपा नेताओं ने न सिर्फ अलगाववादियों के करीब समझी जाने वाली पीडीपी जैसी पार्टी के साथ सरकार बनाई है बल्कि आतंकवाद के उग्र होने के बावजूद महबूबा मुफ्ती की सरकार को कायम रख कर अपनी निरंतरता का परिचय दिया है। यह एक जिम्मेदारीपूर्ण भूमिका है जिसे भाजपा को और आगे बढ़कर निभाना होगा। संयोग से राजनाथ सिंह का कश्मीर का दौरा ऐसे समय हो रहा है जब अंतरराष्ट्रीय स्थितियां भारत के अनुकूल हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान के आतंकी संरक्षण पर निगाह टेढ़ी की है और उसके दोस्त चीन ने भी ब्रिक्स सम्मेलन में कड़ाई दिखाई है। इस बीच घाटी में आतंकवाद की घटनाएं नियंत्रण में आती दिख रही हैं। लेकिन, मात्र इससे समाधान का रास्ता नहीं निकलेगा। सरकार को अंतरराष्ट्रीय स्थितियां अनुकूल बनाने के साथ इस बात पर भी विचार करना होगा कि किन वजहों से पिछले तीन सालों में कश्मीर की स्थिति ज्यादा बिगड़ी है? क्या आंतरिक प्रयासों में कोई कमी है। वार्ताएं रुकी होने से घाटी में जाने-पहचाने चेहरों से अलग अनजान और ज्यादा खतरनाक युवाओं प्रभाव बढ़ा है। इन सब के बावजूद अगर सरकार संवेदना, सहअस्तित्व, आत्मविश्वास और निरंतरता के दायरे को लोगों के सामने स्पष्ट कर पाती है तो स्थितियां बेहतर बनाने में कामयाबी मिल सकती है।

लेख क्रमांक :- 7 (Word Count - 390)


अर्धसैनिक बलों की 41 कंपनियों, चार सैन्य कॉलम और चार राज्यों की पुलिस को मिलाकर सात हजार जवान जिस प्रकार हरियाणा के सिरसा स्थित डेरा सच्चा सौदा की तलाशी ले रहे हैं उसे देर से हुई सही कार्रवाई कहा जा सकता है। इस कार्रवाई में बाबा गुरमीत राम रहीम के अवैध कामों का पता तो चलेगा ही लेकिन, जो कुछ मिलेगा उसे भारतीय राज्य व्यवस्था की नाकामी और समाज की विडंबना का जखीरा भी कहा जा सकता है। बाबा के आश्रम में जितने तरह के पूजा स्थल, आवासीय इमारतें, उद्योग, शैक्षणिक, चिकित्सीय संस्थान और रहस्य रोमांच की गुफाओं समेत डिज़्नीलैंड जैसे मनोरंजक इंतजाम दिखाई पड़ रहे हैं उससे तो यही लगता है कि वहां धर्म के नाम पर समांतर और स्वायत्त सत्ता चल रही थी। चर्चा होनी ही चाहिए कि वहां कितने प्रकार की अवैध संपत्ति, कारोबार और आपराधिक कारनामों के सबूत मिल रहे हैं लेकिन, उससे ज्यादा चर्चा यह होनी चाहिए कि हमारी सरकारें अब तक कर क्या रही थीं? लगता तो यही है कि हमारी व्यवस्था को चलाने वाले अपने निहित स्वार्थ के लिए बाबा के आगे नतमस्तक थे। आज भी अगर अदालत ने आदेश न दिया होता तो शायद ही कार्रवाई हो पाती। तात्पर्य यह है कि कार्यपालिका में एक तरह के पक्षपात की प्रवृत्ति पैदा हो चुकी है, जो लोकतंत्र के लिए घातक है लेकिन, मामला इतना ही नहीं है। पंजाब और हरियाणा में पनपने वाले डेरों के कारोबार के पीछे वह जाति व्यवस्था जिम्मेदार है, जो समाज के दलितों, पिछड़ों को मंदिरों और गुरुद्वारों में समता का अधिकार नहीं देती। उसी नाते वे जाति के वर्चस्व को चुनौती देने वाले डेरों में जाते हैं और वहां जनता की भारी शक्ति का लाभ उठाकर बाबा और धर्मगुरु निरंकुश हो जाते हैं। इससे नोबेल पुरस्कार विजेता लेखक वीएस नायपाल याद आ जाते हैं जो 'इंडिया मिलियन म्यूटिनीज नाउ' में कहते हैं कि भारत में लाखों बगावतें होती रहती हैं। अपनी मशहूर किताब 'गाड मार्केट' में विश्लेषण करते हुए मीरा नंदा कहती हैं कि राज्य, मंदिर और कॉर्पोरेट के गठजोड़ ने बाबाओं की सत्ता को सुदृढ़ और भारत का हिंदूकरण किया है। अगर इस तरह के गठजोड़ को फिर घटित होने से रोकना है तो न सिर्फ समाज सुधार की प्रक्रिया को तेज करना होगा बल्कि जाति और धर्म के आधार पर वोटों का प्रसाद लेने की बजाय उनका लोकतांत्रीकरण करते हुए भारत का बेहतर भविष्य बनाना होगा।

लेख क्रमांक :- 6 (Word Count - 376)


रोहिंग्या शरणार्थियों की समस्या के बीच हो रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की म्यांमार यात्रा भारत की पूरब को देखने वाली व्यापारिक नीति को नया आधार प्रदान करेगी और इस इलाके की सुरक्षा व्यवस्था में नया आयाम जोड़ेगी। इस तीन दिवसीय यात्रा में ग्यारह समझौते हुए हैं, जिनमें परिवहन परियोजनाओं समेत भूकम्प प्रभावित पैगोडा की मरम्मत शामिल है। लेकिन, मोदी की म्यामार की पहली दोतरफा यात्रा होने के नाते इसका विशेष महत्व है, क्योंकि इससे पहले वे 2014 में आसियान देशों की बैठक में गए थे तब वह बहुपक्षीय यात्रा थी। फिलहाल रोहिंग्या मुसलमानों की समस्या ने दोनों देशों के बीच एक तरह की हलचल पैदा की है और अब देखना है कि स्टेट काउंसलर आंग सांग सू की और मोदी किस तरह का समाधान निकालते हैं। यह समस्या शरणार्थी समस्या होने के साथ आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने वाली समस्या भी है। हाल में राखाइन हिंसा में चार सौ रोहिंग्या के मारे जाने के बाद वे बड़ी संख्या में बांग्लादेश में प्रवेश कर रहे हैं और भारत की सीमा पर भी उनके घुसपैठ की चुनौती है। एक तरफ भारत अपने यहां रह रहे चालीस हजार रोहिंग्या को म्यांमार वापस भेजने की तैयारी कर रहा है तो दूसरी तरफ भारतीय सर्वोच्च न्यायालय इसके विरुद्ध दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा है। विडंबना यह है कि म्यांमार उन्हें अपने नागरिकता कानून के तहत जातीय समूहों में शामिल नहीं करता। दोनों देशों के बीच 1400 किलोमीटर की लंबी सीमा के नाते भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की अशांति के कई दूसरे तार म्यांमार से जुड़ते हैं और भारत को उम्मीद है कि इस दौरे के बाद उस बारे में म्यांमार उसे ज्यादा आश्वस्त करेगा। इस बीच चीन की वन रोड वन बेल्ट नीति में शामिल होने के लिए म्यांमार पर दबाव है तो भारत उसे अपने पाले में रखना चाहेगा। यही वजह कि मोदी के दौरे पर चीन की विशेष निगाहें हैं। हांलांकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और मोदी की सकारात्मक वार्ता के बाद आशंकाएं कम होंगी। ऐतिहासिक सांस्कृतिक निकटता होने के कारण भी उन्हें करीब आने में सुविधा होगी। भारत को अपने इस पड़ोसी में रणनीतिक साझीदार तो ढूंढ़ने ही होंगे उसके साथ वहां लोकतांत्रिक आंदोलन को मजबूती देनी होगी, क्योंकि भारत की विशिष्टता और आकर्षण उसके लोकतंत्र में है और यही हमें चीन से अलग करता है।

Wednesday, 7 March 2018

लेख क्रमांक :- 5 (Word Count - 373)


ब्रिक्स देशों के नौवें शिखर सम्मेलन की शियामेन घोषणा में चीन ने आतंकी संगठनों की सूची में पाकिस्तान से गतिविधियां चलाने वाले लश्कर-ए-तय्यबा और जैश-ए-मोहम्मद को शामिल किए जाने की सहमति देकर भारत ही नहीं एशिया और विश्व के साथ अपना भी भला सोचा है। पाकिस्तान के बेहद करीबी देश चीन की तरफ से ऐसा किया जाना भारत के दबाव का परिणाम है। विशेष तौर पर दोकलाम विवाद की पृष्ठभूमि में भारत के सुर में सुर मिलाकर चीन ने यह संदेश भी देना चाहा है कि आर्थिक वैश्वीकरण की प्रक्रिया तभी चल सकती है जब दुनिया में युद्ध व आतंकवाद के लिए कोई जगह न हो। यह देखना होगा कि चीन का यह रुख कब तक कायम रहता है। अभी तो चीन के इस बदले हुए रुख को भारत अपनी राजनयिक सफलता मान सकता है, क्योंकि इससे पहले चीन जैश-ए-मोहम्मद के प्रमुख मौलाना मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित किए जाने के प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में खारिज करवा चुका है। चीन इस मुद्दे पर भारत का समर्थन करने वाली तीन वीटो वाली शक्तियों अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस के दबाव को भी नकार चुका है। निश्चित तौर पर आतंकी संगठनों की यह सूची बहुत लंबी है। लेकिन संगठनों की इस सूची में पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामी मूवमेंट का भी नाम है, जो चीन के शिनजिंग प्रांत में उइगुर समूहों में अलगाववाद पैदा करने वाला समूह है। ब्रिक्स सम्मेलन में भारत, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका समेत चीन का यह रुख उस चिंता से अलग है जो चीन पाकिस्तान के लिए जताता रहा है। हाल में जब नई अफगानिस्तान-पाकिस्तान नीति के एलान पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान को सैन्य अनुदान देने के लिए कड़ी डांट पिलाई थी और आतंकियों के समर्थन की नीति की निंदा की थी तो चीन ने पाकिस्तान की भूमिका की तारीफ करते हुए कहा था कि आतंकवाद से संघर्ष में पाकिस्तान की हिरावल दस्ते की भूमिका को नजरंदाज नहीं करना हिए। मौजूदा रुख उससे काफी अलग है और यहां चीन आतंकवाद पर अपनी दोगली नीति छोड़कर स्पष्टवादिता के रास्ते पर बढ़ता हुआ दिखता है। लेकिन, चीन हमेशा इस रास्ते पर रहेगा इसकी गारंटी तभी हो सकती है जब भारत और रूस जैसे महत्वपूर्ण देश उससे सतत संवाद करें और अपने आर्थिक-राजनयिक हितों का उसके साथ तालमेल उठाएं।

लेख क्रमांक :- 4 (Word Count - 389)


एनडीए सरकार के मंत्रिमंडल में तीसरे फेरबदल की तैयारी के बीच यह सवाल जरूर पूछा जाना चाहिए कि यह सब 2019 और उससे पहले होने वाले विधानसभा चुनावों में विजय के लिए हो रहा है या अच्छे दिन और नए भारत के लिए। हालांकि दावा यही किया जा रहा है कि प्रधानमंत्री कार्यालय ने सभी मंत्रियों का ऑडिट किया है और उनके मूल्यांकन का आधार मंत्रालय से जुड़ी योजनाओं का क्रियान्वयन है और पार्टी की जिम्मेदारियों का लेखा-जोखा है। जिन मंत्रियों को हटाए जाने की चर्चा है उनके पीछे दो कारण प्रमुख हैं- आगामी चुनाव और उनका विभागीय प्रदर्शन। अगर इस्तीफे की पेशकश करने वाले ज्यादातर मंत्री उत्तर प्रदेश के हैं तो उसकी वजह साफ है कि वहां चुनाव हो चुके हैं और अब मध्यप्रदेश जैसे उन राज्यों पर ध्यान देना है जहां चुनाव होने हैं। वैसे उमा भारती, कलराज मिश्र और संजीव बालियान जैसे मंत्रियों का काम भी ऐसा नहीं रहा है कि वे मोदी मंत्रिमंडल के लिए अपरिहार्य बन सकें। काम कौशल विकास मंत्रालय का भी अच्छा नहीं रहा है लेकिन, राजीव प्रताप रुड़ी के हटाए जाने की वजह जनता दल (यू) के एनडीए में शामिल होने के बाद उस पार्टी को जगह देने की है। चुनाव के ही मद्देनजर उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और पूर्वोत्तर भारत के नए चेहरों को मंत्रिमंडल में जगह मिलने की उम्मीद है। अपनी योग्यता और काम के बावजूद सबसे दुर्भाग्यशाली मंत्री सुरेश प्रभु साबित हो सकते हैं, जिन्हें नीतियों और रेल हादसों ने पटरी से उतार रखा है। उनके मंत्रालय का परिवहन में विलय किए जाने की चर्चा है। अगर काम ही मूल्यांकन का आधार है तो सबसे पहले वित्त मंत्री पर गाज गिरनी चाहिए। आज अर्थव्यवस्था की जीडीपी दर तीन साल के सबसे निचले स्तर 5.7 प्रतिशत पर है और वे वित्त के साथ रक्षा मंत्रालय का भी जिम्मा संभाल रहे हैं। विदेश और गृह मंत्रालय के कामों का भी मूल्यांकन होना चाहिए। सबसे अच्छी बात यह है कि करीब पचास सहयोगी दल होने के बावजूद मनमोहन सरकार की तरह इस सरकार के कामकाज पर सहयोगी दलों का दबाव नहीं है। खराब बात यह है कि इसने अर्थव्यवस्था, कला, संस्कृति और समाज में सरकार या उससे जुड़े संगठनों का हस्तक्षेप बढ़ाया है। इसलिए पूरा देश सरकार का मुखापेक्षी हो गया है। यह स्थिति न तो लोकतांत्रिक समाज के लिए ठीक है और न ही खुली अर्थव्यवस्था के विकास के लिए।

लेख क्रमांक :- 3 (Word Count - 388)


डोकलाम विवाद का तनाव झेलने और फिलहाल उसके निपट जाने के बाद चीन और पाकिस्तान की सीमाओं पर निगरानी रखने के लिए उपग्रहों की मदद लेने का फैसला स्वागत योग्य है। वह इस काम का विस्तार बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका जैसे पड़ोसियों के साथ भी कर सकता है, क्योंकि वहां से भी उग्रवाद और तस्करी की समस्याएं देश में प्रवेश करती हैं। भारत की चीन से 3500 किलोमीटर और पाकिस्तान से 2900 किलोमीटर सीमा लगती है और यही सर्वाधिक तनाव पैदा होता रहता है। हालांकि पाकिस्तान और चीन से होने वाले तनाव में फर्क है लेकिन उनमें नज़दीकी बढ़ने के साथ इनकी प्रकृति एक जैसी होती जा रही है। उपग्रह प्रक्षेपण में विशिष्टता विकसित कर चुके भारत के लिए यह काम आसान भी है और दूसरे देशों पर बढ़त देने वाला है। जब ये उपग्रह दिन-रात की तस्वीरें भेजेंगे और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में बनाए जा रहे केंद्र से उनकी निगरानी होगी तो कार्रवाई के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा। तब शायद केंद्र सरकार और भारतीय सेना को भूटान से सूचना मिलने या चमोली के डीएम से संदेश मिलने का इंतजार नहीं रहेगा। पिछले हफ्ते प्रक्षेपित किए गए कार्टोस्टेट उपग्रह को मिलाकर सैनिक कामों में लगे भारतीय उपग्रहों की संख्या अब 13 हो गई है। यह रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट धरती के करीब कक्षा में स्थापित किए जाते हैं और इनकी ऊंचाई 200 से 1200 किलोमीटर तक होती है। इस उपग्रह की विशेषता यह है कि इससे 0.6 मीटर की लंबाई और चौड़ाई वाले इलाके के भीतर होने वाली किसी भी गतिविधि का चित्र लिया जा सकता है। सीमा से मिली तस्वीरों का इस्तेमाल सुरक्षा के साथ ही साथ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर राजनयिक दबाव के लिए भी किया जा सकेगा। अगर कोई देश सैनिक घुसपैठ कर रहा है या कहीं से आतंकी आ रहे हैं तो भारत इस बात को प्रमाण के साथ रख भी सकता है। यह दौर सेनाओं के सीधे युद्ध से हट कर प्रौद्योगिकी युद्ध का है और संभव है कि इस तरह की निगरानी की होड़ इस एशियाई भूभाग में तेज हो। इसलिए इस फैसले का स्वागत करने के साथ यह भी कहना आवश्यक है कि सीमा विवाद सिर्फ उपग्रह की निगरानी से हल नहीं होंगे। उनके लिए राजनीतिक इच्छा शक्ति की जरूरत होगी और जब वह इच्छा शक्ति पैदा होगी तो यह उपग्रह विवाद के बजाय साझी मानवता के लिए काम करेंगे।

लेख क्रमांक :- 2 (Word Count - 373)


सुप्रीम कोर्ट ने 2002 के दंगों में ध्वस्त हुए धार्मिक स्थलों के पुनर्निर्माण के लिए लिए सरकारी सहयोग को खारिज करके उचित ही किया है। ऐसा आदेश गुजरात हाई कोर्ट ने दिया था कि गोधरा घटना के बाद के दंगों में जो पांच सौ आराधना स्थल नष्ट हुए हैं उनकी सरकार मरम्मत कराए। इस आदेश के विरुद्ध गुजरात सरकार की याचिका को स्वीकार करके सुप्रीम कोर्ट ने एक धर्मनिरपेक्ष संविधान का संदेश देना चाहा है। अदालत की दलील है कि संविधान का अनुच्छेद 27 धार्मिक स्थलों के रखरखाव के लिए जनता पर कर लगाने की इजाजत नहीं देता। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार की इस दलील को स्वीकार कर लिया है कि वह आवासीय और वाणिज्यिक स्थलों के नुकसान के लिए सभी को पचास हजार रुपए की अनुग्रह राशि दे रही है लेकिन, वह धार्मिक मामलों में ऐसी मदद नहीं कर सकती। मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र की दो सदस्यीय पीठ ने व्यक्तियों को दी जाने वाली अनुग्रह राशि को इस आधार पर सही माना है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में दिए जीवन और निजी स्वतंत्रता के अधिकार के तहत यह सहयोग जायज है। यह फैसला भारतीय इतिहास की उस घटना की याद दिलाता है, जिसमें उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने सोमनाथ के टूटे हुए मंदिर का सरकारी खर्च से जीर्णोद्धार करवाने से इनकार कर दिया था। उनकी साफ दलील थी कि सरकार धर्मनिरपेक्ष है और उसका काम मंदिर- मस्जिद बनवाना नहीं है। राज्य के इसी धर्मनिरपेक्ष चरित्र का दबाव उन नेताओं पर भी पड़ना चाहिए, जो जिम्मेदार पदों पर बैठने के बाद सरकारी आवासों में पूजा और गंगा जल से सफाई का धार्मिक अभियान चलवाते हैं। इससे राज्य का धर्मिनिरपेक्ष चरित्र खंडित होता है। इसी आधार पर एक बार डॉ. लोहिया ने तत्कालीन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद द्वारा बनारस में ब्राह्मणों के चरण धोने की कड़ी निंदा की थी। राज्य को अपने चरित्र में धर्मनिरपेक्षता रखनी होगी और वह तभी कायम होगी जब उसके शीर्ष पदों पर बैठे लोग अपने व्यवहार में विचलन न करें। समाज के विभिन्न संप्रदायों और संगठनों का यह दायित्व बनता है कि वे दूसरे समुदाय की आहत भावनाओं पर मरहम लगाने में सहयोग दें। अगर हिंदुओं के पूजा स्थल टूटे हैं तो मुस्लिम सहयोग दें और अगर मुस्लिमों के धार्मिक स्थल टूटे हैं तो हिंदू सहयोग करें।

लेख क्रामंक :- 1 (Word Count - 388)


किसी भी लोकतंत्र में विपक्षी एकता की जरूरत से कैसे इनकार किया जा सकता है। फिर देश की मौजूदा स्थिति में तो यह और भी जरूरी है। एकजुट और मुद्दों पर बात करने वाला विपक्ष सत्तारूढ़ दल के लिए भी फायदेमंद होता है क्योंकि तब विकास के एजेंडे पर उसके बने रहने की संभावना बढ़ जाती है। हमारे यहां विपक्ष की एकता के प्रयास जब भी हुए हैं तो यह घोड़े के आगे गाड़ी लगाने जैसी कवायद सिद्ध होती रही है। यानी मुद्दा सामने रखकर एकजुट होने की बजाय नेता सामने रखकर एकता की कोशिश होती है क्योंकि निगाह एकता के परे सत्ता पर होती है। अंततरू नेताओं की महत्वाकांक्षाओं में टकराव बिखराव का नतीजा लेकर आता है। इस मायने में दिल्ली में शरद यादव की पहल पर साझी विरासत बचाने के नाम पर हुई 16 विपक्षी दलों की बैठक को सार्थक पहल कहा जा सकता है क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों में विपक्षी एकता के लिए इससे बेहतर मुद्दा नहीं हो सकता। यह नीतीश कुमार के खिलाफ विद्रोह का झंडा उठाने वाले शरद यादव का व्यक्तिगत शक्ति प्रदर्शन भी था। अब राजद नेता लालू यादव द्वारा अगले हफ्ते पटना में आयोजित रैली में विपक्ष को फिर एकजुटता दिखाने का मौका है। लेकिन ये कवायदें तब तक सांकेतिक ही कहीं जाएंगी जब तक विपक्षी दल यह यकीन नहीं दिला पाते कि वे भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए का ठोस विकल्प दे सकते हैं। इस दिशा में विपक्ष के सामने कई चुनौतियां हैं। सारे दल विभिन्न प्रदेशों में आमने-सामने हैं। वे प्रदेशस्तरीय प्रतिद्वंद्विता को कितना छोड़ पाते हैं। उस पर ही सारा दारोमदार है। फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता शिखर पर है। यही वजह है कि उन्हें सामने रखकर भाजपा को चुनाव लड़ना सुहाता है और इसीलिए विपक्ष को भी कोई नेता सामने रखना पड़ेगा। नीतीश कुमार के जाने से बड़ा रिक्त स्थान पैदा हो गया है। इस जमावड़े में अखिल भारतीय मौजूदगी वाली पार्टी कांग्रेस ही है पर उसमें नेतृत्व का संकट है। ऐसे में क्या यह संभव है कि इन सारे मुद्दों को परे रखकर साझा विरासत को बचाने का मुद्दा पूरा विपक्ष प्रखरता से उठाए और देश की आत्मा को झंकृत कर दे पर यह लंबी लड़ाई होगी। धीरज लगेगा साथ ही भाजपा की सेंधमारी से बचने की सतर्कता व इच्छा भी अनिवार्य होगी। ऐसा हुआ तो विभिन्न दलों के बीच एकता अपने आप स्थापित हो जाएगी।