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Thursday, 22 March 2018

भारतीय दंड संहिता 1860 (भाग - 5)


एकांत परिरोध – जब कभी कोई व्‍यक्ति ऐसे अपराध के लिये दोषसिद्ध ठहराया जाता है जिसके लिये न्‍यायालय को इस संहिता के अधीन उसे कठिन कारावास से दंडादिष्‍ट किया गया है, किसी भाग या भागों के लिये, जो कुल मिलाकर तीन मास से अधिक के न होंगे निम्‍न मापमान के अनुसार एकांत परिरोध में रख जायेगा, अर्थात –

यदि कारावास की अवधि छह मास से अधिक न हो तो एक मास से अनधिक समय;

यदि कारावास की अवधि छह मास से अधिक हो और एक वर्ष से अधिक न हो तो दो मास से अनधिक समय,

यदि कारावास की अवधि एक वर्ष से अधिक हो तो तीन मास से अनधिक समय;

एकांत परिरोध की अवधि – एकांत परिरोध के दंडादेश के निष्‍पादन में ऐसा परिरोध किसी दशा में भी एक बार में चौदह दिन से अधिक न होगा, साथ ही ऐसे एकांत परिरोध की कालावधियों की बीच में उन कालावधियों से अन्‍यून अंतराल होंगे दिया गया कारावास तीन मास से अधिक हो, तब दिये गये सम्‍पूर्ण कारावास के किसी एक मास में एकांत परिरोध सात दिन से अधिक न होगा, साथ ही एकांत परिरोध की कालावधियों के बीच में उन्‍हीं कालावधियों के अन्‍यून अंतराल होंगे ।

पूर्व दोषसिद्धि के पश्‍चात अध्‍याय 12 और अध्‍याय 17 के अधीन कतिपय अपराधों के लिये वर्धित दंड – जो कोई व्‍यक्ति :

(क) भारत में के किसी न्‍यायालय द्वारा इस संहिता के अध्‍याय 12 या अध्‍याय 17 के अधीन तीन वर्ष या उसके अधिक की अवधि के लिये दोनों में से किसी भांति के कारावास से दंडनीय अपराध के लिये ।

(ख) दोषसिद्धि ठहराये जाने के पश्‍चात उन दोनों अध्‍यायों में से किसी अध्‍याय के अधीन उतनी ही अवधि के लिये वैसे ही कारावास से दंडनीय किसी अपराध का दोषी हो, तो वह हर ऐसे पश्‍चातवर्ती अपराध के लिये आजीवन कारावास से या दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेंगी, दंडनीय होगा ।

विधि द्वारा आबद्ध या तथ्‍य की भूल के कारण अपने आपको विधि द्वारा आबद्ध होने का विश्‍वास करने वाले व्‍यक्ति द्वारा किया गया कार्य – कोई बात अपराध नहीं है, जो किसी ऐसे व्‍यक्ति द्वारा की जाये जो उसे करने के लिये विधि द्वारा आबद्ध हो या जो तथ्‍य की भूल के कारण न कि विधि की भूल के कारण, सद्भावपूर्वक विश्‍वास करता हो कि वह उसे करने के लिए विधि द्वारा आबद्ध है ।

न्‍यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में किया गया कार्य – कोई बात, तो न्‍यायालय के निर्णय या आदेश के अनुसरण में की जाये या उसके द्वारा अधिदिष्‍ट हो, यदि वह उस निर्णय या आदेश से प्रवृत्‍त रहते की जाये, अपराध नहीं है, चाहे उस न्‍यायालय को ऐसा निर्णय या आदेश देने की अधिकारिता न रही हो, परंतु यह तब जबकि वह कार्य करने वाला व्‍यक्ति सद्भावपूर्वक विश्‍वास करता हो कि उस न्‍यायालय को वैसी अधिकारिता थी ।

(Word Count - 461)

Sunday, 18 March 2018

भारतीय दंड संहिता 1860 (भाग - 4)


जुर्माना देने पर कारावास का पर्यवसान हो जाना – जुर्माना देने में व्‍यक्तिक्रम होने की दशा के लिये अधिरोपित कारावास तब पर्यवसित हो जायेगा, जब वह जुर्माना या तो चुका दिया जाये या विधि की प्रक्रिया द्वारा उद्गृहीत कर लिया जाये । 

जुर्माना जमा करने की जो अवधि है उसमें विस्‍तार करने का न्‍यायालय को अधिकार नहीं माना गया । याचिकाकारगण को भारतीय दंड संहिता की धारा 68 के प्रावधान के तहत उपचार हासिल करना चाहिए । 

जुर्माने के आनुपातिक भाग के दिये जाने की दशा में कारावास का पर्यवसान – यदि जुर्माना देने में व्‍यक्तिक्रम होने की दशा के लिये नियत की गई कारावास की अवधि का अवसान होने से पूर्व जुर्माने का ऐसा अनुपात चुका दिया या उद्गृहीत कर लिया जाये कि देने में व्‍यक्तिक्रम होने पर कारावास की जो अवधि भोगी जा चुकी हो, वह जुर्माने के तब तक न चुकाये गये भाग के आनुप‍ातिक से कम न हो तो कारावास पर्यवसित हो जायेगा । 

जुर्माने का छह वर्ष के भीतर या कारावास के दौरान में उद्गृहीत होना एवं सम्‍पत्ति को दायित्‍व से मृत्‍यु उन्‍मुक्‍त नहीं करती – जुर्माना या उसका कोई भाग, जो चुकाया न गया हो, दंडादेश दिये जाने के पश्‍चात छह वर्ष के भीतर किसी भी समय, और यदि अपराधी दंडादेश के अधीन छह वर्ष से अधिक के कारावास से दंडनीय हो तो उस कालावधि के अवसान से पूर्व किसी भी समय, उद्गृहीत किया जा सकेगा, और अपराधी की मृत्‍यु किसी भी सम्‍पत्ति को, जो उसकी मृत्‍यु के पश्‍चात उसके ऋणों के लिये वैध रूप से दायी हो, इस दायित्‍व से उन्‍मुक्‍त नहीं करती । 

कई अपराधों से मिलकर बने अपराध के लिये दंड की अवधि – जहां कि कोई बात, जो अपराध है, ऐसे भागों से, जिनमें का कोई भाग स्‍वयं अपराध है, मिलकर बनी है, वहां अपराधी अपने ऐसे अपराधों में से एक से अधिक के दंड से दंडित न किया जायेगा, जब तक कि ऐसा अभिव्‍यक्‍त रूप से उपबंधित न हो । 

जहां कि कोई बात अपराधों को परिभाषित या दंडित करने वाली किसी तत्‍समय प्रवृत्‍त विधि की दो या अधिक पृथक परिभाषाओं में आने वाला अपराध है, अथवा 

जहां कोई कार्य, जिसमें से स्‍वयं एक से या स्‍वयं एकाधिक से अपराध गठित होता है, मिलकर भिन्‍न अपराध गठित करते हैं; 

वहां अपराधी को उससे गुरुत्‍तर दंड से दंडित न किया जायेगा, जो ऐसे अपराधों में से किसी भी एक के लिये वह न्‍यायालय, जो उसका विचारण करे, उसे दे सकता हो । 

कई अपराधों में से एक दोषी व्‍यक्ति के लिये दंड जबकि निर्णय में यह कथित है कि यह संदेह है कि वह किस अपराध का दोषी है – उन सब मामलों में जिनमें यह निर्णय दिया जाता है कि कोई व्‍यक्ति उस निर्णय में विनिर्दिष्‍ट कई अपराधों में से एक अपराध का दोषी है, किंतु यह संदेहपूर्ण है कि वह उन अपराधों में से किस अपराध का दोषी है, यदि वही दंड सब अपराधों के लिये उपबंधित नहीं है तो वह अपराधी उस अपराध के लिये दंडित किया जायेगा, जिसके लिये कम से कम दंड उपबंधित किया गया है ।

(Word Count - 489)

Friday, 16 March 2018

भारतीय दंड संहिता 1860 (भाग - 3)


आजीवन कारावास के दंडादेश का लघुकरण – हर मामले में जिसमें आजीवन कारावास का दंडादेश दिया गया हो, अपराधी की सम्‍मति के बिना भी समुचित सरकार उस दंड को ऐसी अवधि के लिए, जो 14 वर्ष से अधिक न हो, दोनों में से किसी भांति के कारावास में लघुकृत कर सकेगी। 

दंडादिष्‍ट कारावास के कतिपय मामलों में संपूर्ण कारावास या उसका कोई भाग कठिन या सादा हो सकेगा – हर मामले में, जिसमें अपराधी दोनों में किसी भांति के कारावास से दंडनीय है, वह न्‍यायालय, जो ऐसे अपराधी को दंडादेश देगा, सक्षम होगा कि दंडादेश में यह निर्दिष्‍ट करें कि ऐसा संपूर्ण कारावास कठिन होगा, या यह कि ऐसा संपूर्ण कारावास सादा होगा। 

जुर्माने की रकम – जहां कि वह राशि अभिव्‍यक्त नहीं की गई है जितनी तक जुर्माना हो सकता है वहां अपराधी जिस रकम में जुर्माना का दायी है, वह अमर्यादित है किंतु अत्‍यधिक नहीं होगी। 

जुर्माना न देने पर कारावास का दंडादेश – कारावास और जुर्माना दोनों से दंडनीय अपराध के हर मामले में, जिसमें अपराधी करावास सहित या रहित, जुर्माना से दंडादिष्‍ट है। 

तथा कारावास या जुर्माने अथवा केवल जुर्माने से दंडनीय अपराध के हर मामले में, जिसमें अपराधी जुर्माने से दंडाविष्‍ट हुआ है। 

वह न्‍यायालय, जो ऐसे अपराधी को दंडाविष्‍ट करेगा, सक्षम होगा कि दंडादेश द्वारा निदेश दे कि जुर्माना देने में व्‍यतिक्रम होने की दशा में, अपराधी अमुक अवधि के लिये कारावास भोगेगा जो कारावास उस अन्‍य कारावास के अतिरिक्‍त होगा जिसके लिये वह दंडादिष्‍ट हुआ है या जिससे वह दंडादेश के लघुकरण पर दंडनीय है। 

जबकि कारावास और जुर्माना दोनों आदिष्‍ट किये जा सकते हैं, तब जुर्माना न देने पर कारावास की अवधि – यदि अपराध कारावास और जुर्माना दोनों से दंडनीय हो, तो वह अवधि, जिसके लिये जुर्माना देने में व्‍यतिक्रम होने की दशा के लिये न्‍यायालय अपराधी को कारावासित करने का निदेश दे, कारावास की उस अवधि की एक-चौथाई से अधिक न होगी जो अपराध के लिये अधिकतम नियत है। 

जुर्माना न देने पर किस भांति का कारावास दिया जाये – वह कारावास, जिसे न्‍यायालय जुर्माना देने में व्‍यतिक्रम होने के लिये अधिरोपित करे, ऐसा किसी भांति का हो सकेगा, जिससे अपराधी को उस अपराध के लिये दंडाविष्‍ट किया जा सकता था। 

जुर्माना न देने पर कारावास, जबकि अपराध केवल जुर्माना से दंडनीय हो – यदि अपराध केवल जुर्माने से दंडनीय हो तो वह कारावास, जिसे न्‍यायालय जुर्माना देने में व्‍यतिक्रम होने की दशा के लिये अधिरोपित करे, सादा होगा और वह अवधि, जिसके लिये जुर्माना देने में व्‍यतिक्रम होने की दशा के लिये न्‍यायालय अपराधी को कारावासित करने का निदेश दे, निम्‍न मापमान से अधिक नहीं होगी, अर्थात, - जबकि जुर्माने का परिणाम पचास रूपये से अधिक न हो तब दो मास से अनधिक कोई अवधि, तथा जबकि जुर्माने का परिमाण एक सौ रुपये से अधिक न हो तब चार मास से अनधिक कोई अवधि, तथा किसी अन्‍य दशा मे छह मास से अनधिक कोई अवधि । 

(Word Count - 469)

Friday, 9 March 2018

भारतीय दंड संहिता 1860 (भाग - 2)


सामान्‍य आशय को अग्रसर करने में कई व्‍यक्तियों द्वारा किए गए कार्य – जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्‍यक्तियों द्वारा अपने सब के सामान्‍य आशय करने में किया जाता है, तब ऐसी व्‍यक्तियों में से हर व्‍यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्‍व के अधीन है, मानो वह कार्य अकेले उसी ने ही किया हो। 

जबकि ऐसा कार्य इस कारण आपराधिक है कि वह आपराधिक ज्ञान या आशय से किया गया है – जब कभी काई-कार्य, जो आपराधिक ज्ञान या आशय से किए जाने के कारण ही आपराधिक है, कई व्‍यक्तियों द्वारा किया जाता है, तब ऐसे व्‍यक्तियों में से हर व्‍यक्ति, जो ऐसे ज्ञान या आशय से उस कार्य में सम्मिलित होता है, उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्‍व के अधीन है, मानो वह कार्य उस ज्ञान या आशय से अकेले उसी के द्वारा किया गया हो। 

अंशत: कार्य द्वारा या अंशत: लोप द्वारा कारित परिणाम – जहां कही किसी कार्य द्वारा या किसी लोप द्वारा किसी परिणाम का कारित किया जाना या उस परिणाम को कारित करने का प्रयत्‍न करना अपराध है, वहां यह समझा जाता है कि उस परिणाम का अंशत: कार्य द्वारा और अंशत: लोप द्वारा कारित किया जाना वही अपराध है। 

किसी अपराध को गठित करने वाले कई कार्यों में से किसी एक को करके सहयोग करना – जब कि कोई अपराध कई कार्यों द्वारा किया जाात है, तब जो कोई या तो अकेले या किसी अन्‍य व्‍यक्ति के साथ सम्मिलित होकर उन कार्यों में से कोई एक कार्य करके अपराध के किए जाने में साशय सहयोग करता है, वह उस अपराध को करता है। 

आपराधिक कार्य में संपृक्‍त व्‍यक्ति विभिन्‍न अपराधों के दोषी हो सकेंगे – जहां कि कई व्‍यक्ति किसी आपराधिक कार्य को करने में लगे हुए या संपृक्‍त है, वहां वे उस कार्य के आधार पर विभिन्‍न अपराधों के दोषी हो सकेंगे। 

‘स्‍वेच्छया’ – कोई व्‍यक्ति किसी परिणाम को ‘स्‍वेच्‍छया’ कारित करता है। जब वह उसे साधनों के द्वारा कारित करता है, जिनके द्वारा उसे कारित उसका आशय था या उन साधनों द्वारा कारित करता है जिन साधनों को काम में लाते समय वह यह जानता था, या यह विश्‍वास करने का कारण रखता था, कि उनसे उसका कारित होना संभाव्‍य है। 

‘अपराध’ – इस धारा के खंड 2 और 3 में वर्णित अध्‍यायों और धाराओं के सिवाय ‘अपराध’ शब्‍द इस संहिता द्वारा दंडनीय की गई किसी बात का द्योतक है। 

निर्वासन के प्रति निर्देश का अर्थ लगाना – 1 उपधारा 2 के और उपधारा 3 के उपबंधों के अध्‍यधीन किसी अन्‍य तत्‍समय प्रवृत्त विधि में, या किसी ऐसी विधि या किसी निरसित अधिनियमित के आधार पर प्रभावशील किसी लिखित या आदेश में ‘आजीवन निर्वासन’ के प्रति निर्देश का अर्थ लगाया जाएगा, कि वह ‘आजीवन कारावास’ के प्रति निर्देश है। 

मृत्‍यु दंडादेश का लघुकरण – हर मामले में, जिसमें मृत्‍यु का दंडादेश दिया गया हो, उस दंड को अपराधी की सम्‍मति के बिना भी समुचित सरकार इस संहिता द्वारा उपबंधित किसी अन्‍य दंड में लघुकृत कर सकेगी।

(Word Count - 478)

Thursday, 8 March 2018

भारतीय दंड संहिता 1860 (भाग - 1)


भारत के भीतर किए गए अपराधों का दंड – हर व्‍यक्ति इस संहिता के उपबंधों के प्रतिकूल हर कार्य या लोप के लिए जिसका वह भारत के भीतर दोषी होगा, इस संहिता के अधीन दंडनीय होगा अन्‍यथा नहीं। 

भारत से परे किए गए किंतु उसके भीतर विधि के अनुसार विचारणीय अपराधों का दंड – भारत से परे किए गए अपराध के लिए जो कोई व्‍यक्ति किसी भारतीय विधि के अनुसार विचारण का प्रात्र हो भारत से परे किए गए किसी कार्य के लिए उससे इस संहिता के उपबंधों के अनुसार ऐसा बरता (समंक्षा) जाएगा, मानो वह कार्य भारत के भीतर किया गया था। 

कुछ विधियों पर इस अधिनियम द्वारा प्रभाव न डाला जाना – इस अधिनियम में की कोई बात भारत सरकार की सेवा के ऑफिसरों, सैनिकों, नौसैनिकों या वायुसैनिकों द्वारा विद्रोह और अभित्‍यजन को दंडित करने वाले किसी अधिनियम के उपबंधों, या किसी विशेष या स्‍थानीय विधि के उपबंधों पर प्रभाव नहीं डालेगी। 

संहिता में की परिभाषाओं का अपवादों के अध्‍यधीन समझा जाना – इस संहिता में सर्वत्र अपराध की हर परिभाषा, हर दंड उपबंधा और हर ऐसी परिभाषा या दंड उपबंधा का हर दृष्‍टांत, ‘साधारण अपवाद’ शीषर्क वाले अध्‍याय में अंतर्विष्‍ट अपवादों के अध्‍यधीन समझा जाएगा, चाहे उन अपवादों को ऐसी परिभाषा, दंड उपबंधा या दृष्‍टांत में दुहराया न गया हो। 

न्‍यायाधीश – ‘न्‍यायाधीश’ शब्‍द न केवल हर ऐसे व्‍यक्ति का द्योतक होता है, जो पद रूप से न्‍यायाधीश अभिहित हो, किंतु उस हर व्‍यक्ति का द्योतक है, जो किसी विधि कार्यवाही में, चाहे वह सिविल हो या दांडिक, अंतिम निर्णय या ऐसा निर्णय, जो उसके विरुद्ध अपील न होने पर अंतिम हो जाए, या ऐसा निर्णय, जो किसी अन्‍य प्राधिकारी द्वारा पुष्‍ट किए जाने पर अंतिम हो जाए, देने के लिए विधि द्वारा सशक्‍त किया गया हो। 

न्‍यायालय – ‘न्‍यायालय’ शब्‍द उस न्‍यायाधीश का, जिसे अकेले ही का न्‍यायिकत: कार्य करने के लिए विधि द्वारा सशक्‍त किया गया हो, उस न्‍यायाधीश-निकाय का, जिसे एक निकाय के रूप में न्‍यायिकत: कार्य करने क लिए विधि द्वारा सशक्‍त किया गया हो, जब कि ऐसा न्‍यायाधीश या न्‍यायाधीश-निकाय न्‍यायिकत: कार्य कर रहा हो, द्योतक है।

(Word Count - 339)