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Saturday, 24 March 2018

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (भाग - 4)


जहाँ न्‍यायालयों की अधिकारिता की स्‍थानी सीमाएं अनिश्चित है वहाँ वाद के संस्थित किए जाने का स्‍थान – जहाँ यह अभिकथित किया जाता है कि यह अनिश्चित है कि कोई स्‍थावर संपत्ति दो या अधिक न्‍यायालयों में से किसी न्‍यायालय की अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर स्थित है वहाँ उन न्‍यायालयों में से कोई भी एक न्‍यायालय, यदि उसका समाधान हो जाता है कि अभिकथित अनिश्चिता के लिए आधार है, उस भाव का कथन अभिलिखित कर सकेगा और तब उस संपत्ति के संबंधित किसी भी वाद को ग्रहण करने और उसका निपटारा करने के लिए आगे कार्यवाही कर सकेगा, और उस वाद में उसकी डिक्री का वही प्रभाव होगा मानो वह संपत्ति उसकी अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर स्थित हो : 

परंतु यह तब जबकि वह वादा ऐसा है जिसके संबंध में न्‍यायालय उस वाद की प्रकृति और मूल्‍य की दृष्टि के अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए सक्षम है । 

जहाँ उपधारा 1 के अधीन अभिलिखित नहीं किया गया है और किसी अपील या पुनरीक्षण न्‍यायालय के सामने या आक्षेप किया जाता है कि ऐसी संपत्ति के संबंधित वाद में डिक्री या आदेश ऐसे न्‍यायालय द्वारा किया गया था जिसकी वहाँ अधिकारिता नहीं थी जहाँ संपत्ति स्थित है वही अपील या पुनरीक्षण न्‍यायालय उस आक्षेप को तब तक अनुज्ञात नहीं करेगा जब तक कि उसकी राय न हो कि वाद के संस्थित किया जाने के समय उसके संबंध में अधिकारिता रखने वाले न्‍यायालय के बारे में अनिश्चितता के लिए कोई युक्तियुक्‍त आधार नहीं थ उसके परिणामस्‍वरूप न्‍याय की निष्‍फलता हुई है । 


शरीर या जंगम संपत्ति के प्रति किए गए दोषों के लिए प्रतिकर के लिए वाद – जहाँ वाद की शरीर या जंगम संपत्ति के प्रति किए गए दोष के लिए प्रतिकर के लिए है वहाँ यदि दोष एक न्‍यायालय की अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर किया गया था और प्रतिवादी किसी अन्‍य न्‍यायालय की अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्‍वयं काम करता है तो वाद वादी के विकल्‍प पर उक्‍त न्‍यायालयों में से किसी भी न्‍यायालय में संस्थित किया जा सकेगा । 



अन्‍य वाद वहाँ संस्थित किए जा सकेंगे जहाँ प्रतिवादी निवास करते हैं या वाद-हेतुक पैदा होता है – पूर्वोक्‍त परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, हर वाद ऐसे न्‍यायालय में संस्थित किया जाएगा जिसकी अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर : 


(क) प्रतिवादी या जहाँ एक से अधिक प्रतिवादी है वहाँ प्रतिवादियों में से हर एक वाद के प्रारंभ के समय वास्‍तव में और स्‍वेच्‍छा से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्‍वयं काम करता है, अथवा; 

(ख) जहाँ एक से अधिक प्रतिवादी है वहाँ प्रतिवादियों में से कोई भी प्रतिवादी वाद के प्रारंभ के समय वास्‍तव में और स्‍वेच्‍छा से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्‍वयं काम करता है, परंतु यह तब जबकि ऐसे अवस्‍था में या तो न्‍यायालय की इजाजत दे दी गई है या जो प्रतिवादी पूर्वोक्‍त रूप में निवास नहीं करने या कारबार नहीं करते या अभिलाभ के लिए स्‍वयं काम नहीं करते, वे ऐसे संस्थित किए जाने के लिए उपगत हो गए है, अथवा; 

(ग) वाद-हेतुक पूर्णत: या भागत: पैदा होता है ।

(Word Count - 521)

Sunday, 18 March 2018

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (भाग - 3)


अतिरिक्‍त वाद का वर्जन – जहां वादी किसी विशिष्‍ट वाद-हेतुक के संबंध में अतिरिक्‍त वाद संस्थित करने से नियमों द्वारा प्रवारित है वहां वह किसी ऐसे न्‍यायालय में जिसे यह संहिता लागू है, कोई वाद ऐसे वाद-हेतुक के संबंध में संस्थित करने का हकदार नहीं होगा । 

विदेशी निर्णय कब निश्‍चायक नहीं होगा – विदेशी निर्णय, उसके पक्षकारों के बीच या उसी हक से अधीन मुकदमा करने वाले ऐसे पक्षकारों के बीच, जिनसे व्‍युत्‍पन्‍न अधिकार के अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते है, प्रत्‍यक्षत: न्‍यायानिर्णीत किसी विषय के बारे में वहां के सिवाय निश्‍चयात्‍मक होगा । 

विदेशी निर्णयों के बारे में उपधारणा – न्‍यायालय किसी ऐसे दस्‍तावेज के पेश किए जाने पर जो विदेशी निर्णय की प्रमाणित प्रति होना तात्‍पर्यित है यदि अीिालेख के इसके प्रतिकूल प्र‍तीत नहीं होता है तो यह उपधारणा करेगा कि ऐसा निर्णय सक्षम अधिकारिता वाले न्‍यायालय द्वारा सुनाया गया था किंतु ऐसा उपधारणा को अधिकारिता का अभाव साबित करके विस्‍थापित किया जा सकेगा । 

वह न्‍यायालय जिसमें वाद संस्थित किया जाए – हर वाद उस निम्‍नतम श्रेणी के न्‍यायालय में संस्थित कया जाएगा जो उसका विचारण करने के लिए सक्षम है । 

वादों का वहाँ स‍ंस्थित किया जाना जहां विषय–वस्‍तु स्थित है – किसी विधि द्वारा विहित धन-संबंधी या अन्‍य परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, वे वाद जो – 

(क) भाटक या लाभों के सहित या रहित स्‍थावन के प्रत्‍युद्धरण के लिए, 
(ख) स्‍थावर संपत्ति के विभाजन के लिए, 
(ग) स्‍थावर संपत्ति के बंध की या उस पर के भार की दशा में पुरोबंध, विक्रय या मोचन के लिए, 
(घ) स्‍थावर संपत्ति में के किसी अन्‍य अधिकार या हित के अवधारण के लिए, 
(ङ) स्‍थावर संपित्‍त के प्रति किए गए दोष के लिए प्रतिकर के लिए, 
(च) करस्‍थम् या कुर्की के वस्‍तुत ; अधीन जगम संपत्ति के प्रत्‍युद्धरण के लिए हैं, 

उस न्‍यायालय में संस्थित किए जाएंगे जिसकी अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर वह संपत्ति स्थित है 

परंतु प्रतिवादी के द्वारा या निमित्‍त धारित स्‍थावर संपत्ति के संबंध में अनुतोष की या ऐसी संपत्ति के प्रति किए गए दोष के लिए प्रतिकर की अभिप्राप्ति के लिए वाद, जहाँ चाहा गया अनुतोष उसके स्‍वीय आज्ञानुवर्तन के द्वारा पूर्ण रूप से अभिप्राप्‍त किया जा सकता है, उस न्‍यायालय में जिसकी अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर संपत्ति स्थित है या उस न्‍यायालय में जिसकी अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर प्रतिवादी वास्‍तव में और स्‍वेच्‍छा से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्‍वयं काम करता है, संस्थित किया जा सकेगा । 

विभिन्‍न न्‍यायालयों की अधिकारिता के भीतर स्थित स्‍थाव संपत्ति के लिए वाद – जहाँ वाद विभिन्‍न न्‍यायालयों की अधिकारिता के भीतर स्थित स्‍थाव संपित्‍त के संबंध में अनुतोष की या ऐसी संपत्ति के प्रति किए गए दोष के लिए प्रतिकर की अभिप्राप्ति के लिए है वहाँ वह वाद किसी भी ऐसे न्‍यायालय में संस्थित किया जा सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाओं के भीतर संपत्ति का कोई भाग स्थित है : 

परंतु यह तब जबकि पूरा दावा उस वाद की विषय-वस्‍तु के मूल्‍य की दृष्टि से ऐसे न्‍यायालय द्वारा संज्ञेय है ।

(Word Count - 492)

Friday, 9 March 2018

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (भाग - 2)


जब तक कि वर्जित न हो, न्‍यायालय सभी सिविल वादों का विचारण करेंगे – न्‍यायालयों को (इसमें अंतर्विष्‍ट उपबंधों के अधीन रहते हुए) उन वादों के सिवाय, जिनका उनके द्वारा संज्ञान अभिव्‍यक्त या विवक्षित रूप से वर्जित है, सिविल प्रकृति के सभी वादों के विचारण की अधिकारिता होगी। 

स्‍पष्‍टीकरण 1 – वह वाद, जिसमें संपत्ति-संबंधी या पद-संबंधी अधिकार प्रतिपादित है, इस बात के होते हुए भी कि ऐसा अधिकार धार्मिक कृत्‍यों या कर्मों संबंधी प्रश्‍नों के विनिश्‍चय पर पूर्ण रूप से अवलंबित है, सिविल प्रकृति का वाद है। 

स्‍पष्‍टीकरण 2 – इस धारा के प्रयोजनों के लिए, यह बात तात्विक नहीं है कि स्‍पष्‍टीकरण 1 में निर्दिष्‍ट पद के लिए कोई फीस है या नहीं अथवा ऐसा पद किसी विशिष्‍ट स्‍थान से जुड़ा है या नहीं। 

वाद का रोक दिया जाना :- कोई न्‍यायालय ऐसे किसी भी वाद के विचारण में जिसमें विवाद्य-विषय उसी के अधीन मुकदमा करने वाले किन्‍हीं पक्षकारों के बीच के या ऐसे पक्षकारों के बीच के, जिनसे व्‍युत्‍पन्‍न अधिकार के अधीन वे या उनमें से काई दावा करते हैं, कि पूर्वतन संस्थित वाद में भी प्रत्‍यक्षत: और सारत: विवाद्य है, आगे कार्यवाही नहीं करेगा जहां ऐसा वाद उसी न्‍यायालय में या भारत में के किसी अन्‍य ऐसे न्‍यायालय में, जो दावा किया गया अनुतोष देने की अधिकारिता रखता है या भारत की सीमाओं के परे वाले किसी ऐसे न्‍यायालय में, जो केंद्रीय सरकार द्वारा स्‍थापित किया गया है या चालू रखा गया है और, वैसी ही अधिकारिता रखता है, या उच्‍चतम न्‍यायालय के समक्ष लंबित है। 

स्‍पष्‍टीकरण – विदेशी न्‍यायालय में किसी वाद का लंबित होना उसी वाद-हेतुक पर आधारित किसी वाद का विचारण करने से भारत में के न्‍यायालयों को प्रवारित नहीं करता । 

पूर्व-न्‍याय – काई भी न्‍यायालय किसी ऐसे वाद या विवाद्ययक का विचारण नहीं करेगा जिसमें प्रत्‍यक्ष: और सारत: विवाद्य-विषय उसी हक के अधीन वे या उनमें से कोई दावा करते हैं, किसी पूर्ववर्ती वाद में भी ऐसे न्‍यायालय में प्रत्‍यक्षत: और सारत: विवाद्य रहा है, जो ऐसे पश्‍चात्वर्ती वाद का या उस वाद का, जिसमें ऐसा विवाद्यक वाद में उठाया गया है, विचारण करने के लिए सक्षम था और ऐसे न्‍यायालय द्वारा सुना जा चुका है और अंतिम रूप से विनिश्चित किया जा चुका है। 

स्‍पष्‍टीकरण 1 – ‘पूर्ववर्ती वाद’ पद ऐसे वाद का द्योतक है जो प्रश्‍नगत वाद के पूर्व ही विनिश्चित किया जा चुका है चाहे वह उससे पूर्व संस्थित किया गया हो या नहीं। 

स्‍पष्‍टीकरण 2 – इस धारा के प्रयोजनों के लिए, न्‍यायालय की सक्षमता का अवधारण ऐसे न्‍यायालय के विनिश्‍चय के अपील करने के अधिकार विषयक किन्‍हीं उपबंधों का विचारण किए बिना जाएगा। 

स्‍पष्‍टीकरण 3 – ऊपर निर्देशित विषय का पूर्ववर्ती वाद में एक पक्षकार द्वारा अभिकथन और दूसरे द्वारा अभिव्‍यक्‍त का विवक्षित रूप से प्रत्‍याख्‍यान या स्‍वीकृति आवश्‍यक है। 

स्‍पष्‍टीकरण 4 – ऐसे किसी भी विषय के बारे में, जो ऐसे पूर्ववर्ती वाद में प्रतिरक्षा या आक्रमण का आधार बनाया जा सकता था और बानाया जाना चाहिए था, यह समझा जाएगा कि वह से वाद में प्रत्‍यक्षत: और सारत: विवाद्य रहा है। 

स्‍पष्‍टीकरण 5 – वाद-पत्र में दावा किया गया कोई अनुतोष, जो डिक्री द्वारा अभिव्‍यक्‍त रूप से नहीं दिया गया है, इस धारा के प्रयोजनों के लिए नामंजूर कर दिया गया समझाा जाएगा।

(Word Count - 518)

Thursday, 8 March 2018

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (भाग :- 1)


न्‍यायालयों की अधीनस्‍थता – इस संहिता के प्रयोजनों के लिए, जिला न्‍यायायल उच्‍च न्‍यायालय के अधीनस्‍थ है और जिला न्‍यायालय से अवर श्रेणी का हर सिविल न्‍यायालय और हर लघुवाद न्‍यायालय, उच्‍च न्‍यायालय और जिला न्‍यायालय के अधीनस्‍थ है। 

व्‍यवृत्तियां  इकसे प्रतिकूल किसी विनिर्दिष्‍ट उपबंध के अभाव में, इस संहिता की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी विशेष या स्‍थानीय विधि को, जो अब प्रवृत्त है या तत्‍समय प्रवृत्त किसी अन्‍य विधि द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी विशेष अधिकारिता या शक्ति को या विहित प्रक्रिया के किसी विशेष रूप को परिसीमित करती है या उस पर अन्‍यथा प्रभाव डालती है। 

उपधारा 1 में अन्‍तर्विष्‍ट प्रतिपादना की व्‍यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस संहिता की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी ऐसे उपचार को परिसीमित करती है या उस पर अन्‍यथा प्रभाव डालती है, जिसे भू-धारक या भू-स्‍वामी कृषि-भूमि के भाटक की वसूली ऐसी भूमि की उपज से करने के लिए तत्‍समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रखता है। 

संहिता का राजस्‍व न्‍यायालयों को लागू होना – जहां कोई राजस्‍व न्‍यायालय प्रक्रिया संबंधी ऐसी बातों में जिन पर ऐसे न्‍यायालयों को लागू कोई विशेष अधिनियमिति मौन है, इस संहिता से उपबंधों द्वारा शासित है वह राज्‍य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह घोषणा कर सकेगी कि उन उपबंधों के कोई भी प्रभाग, जो इस संहिता द्वारा अभिव्‍यक्‍त रूप से लागू नहीं किए गए है, उन न्‍यायालयों को लागू नहीं होंगे या उन्‍हें केवल ऐसे उपान्‍तरों के साथ लागू होंगे जैसे राज्‍य सरकार विहित करे। 

उपधारा 1 में ‘राजस्‍व न्‍यायालय’ से ऐसा न्‍यायालय अभिप्रेत है जो कृषि प्रयोजनों के लिए प्रयुक्‍त भूमि के भाटक, राजस्‍व या लाभों से संबंधित वादों या अन्‍य कार्यवाहियों को ग्रहरण करने की अधिकारिता किसी स्‍थानीय विधि के अधीन रखता है किंतु ऐसे वादों या कार्यवाहियों का विचारण सिविल प्रकृति के वादों या कार्यवाहियों के रूप में करने के लिए इस संहिता के अधीन आरम्भिक अधिकारिता रखने वाला सिविल न्‍यायालय इसके अंतर्गत नहीं आता है। 

धन संबंधी अधिकारिता – अभिव्‍य‍क्‍त रूप से जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, इसकी किसी बात का प्रभाव ऐसा नहीं होगा कि वह किसी न्‍यायायल को उन वादों पर अधिकारिता दे दे जिनकी रकम या जिनकी विषय-वस्‍तु का मूल्‍य उसकी मामूली अधिकारिता की धन संबंधी सीमाओं से (यदि कोई हो) अधिक है। 

प्रांतीय लघुवाद न्‍यायालय – उन न्‍यायालयों पर, जो प्रांतीय लघुवाद न्‍यायालय अधिनियम, 1887 (1887 का 9) के अधीन या बरार लघुवाद न्‍यायालय विधि, 1905 के अधीन गठित हैं, या उन न्‍यायालयों पर, जो लघुवाद न्‍यायालय की अधिकारिता का प्रयोग उक्‍त अधिनियम या विधि के अधीन करते हैं या भारत के किसी ऐसे भग के जिस पर उक्‍त अधिनियम का विस्‍तार नहीं है उन न्‍यायालयों पर, जो समरूपी अधिकारिता का प्रयोग करते हैं

(Word Count - 452)

Wednesday, 7 March 2018

सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (प्रस्‍तावना)


संक्षिप्‍त नाम प्रारंभ और विस्‍तार :- इस अधिनियम का संक्षिप्‍त नाम सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 है। यह सन् 1909 की जनवारी के प्रथम दिन को प्रवृत्‍त होगा। इसका विस्‍तार जम्‍मू-कश्‍मीर राज्‍य, नागालैण्‍ड राज्‍य और जनजाति क्षेत्रों के सिवाय सम्‍पूर्ण भारत पर है। परंतु संबंधित राज्‍य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस संहिता के उपबंधों का या उनमें से किसी का विस्‍तार, यथास्थिति, सम्‍पूर्ण नागालैण्‍ड राज्‍य या ऐसे जनजाति क्षेत्रों या उनके किसी भाग पर ऐसे अनुपूरक, आनुषंगिक या पारिणामिक उपान्‍तरों सहित कर सकेगी जो अधिसूचना में विनिर्दिष्‍ट किए जाए। 

स्‍पष्‍टीकरण – इस खंड में ‘जनजाति क्षेत्र’ से व‍े राज्‍यक्षेत्र अभिप्रेत है जो 21 जनवरी, 1972 के ठीक पहले संविधान की छठी अनुसूची के पैरा 20 में यथानिर्दिष्‍ट असम के जनजाति क्षेत्र में सम्मिलित थे। 

पिरभाषाएं – इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो – 

‘संहिता’ के अंतर्गत नियम आते हैं 

‘डिक्री’ से ऐसे न्‍यायनिर्णयन की प्ररूपिक अभिव्‍यक्ति अभिप्रेत है जो, जहां तक कि वह उसे अभिव्‍यक्‍त करने वाले न्‍यायलय से संबंधित है, वाद में के सभी या किन्‍हीं विवादग्रस्‍त विषयों के संबंध में पक्षकारों के अधिकारों का निश्‍चायक रूप से अवधारण करता है औश्र वह या तो प्रारम्भिक या अंतिम हो सकेगी। यह समझा जाएगा कि इसके अंतर्गत वादपत्र का नामंजूर किया जाना और धारा 144 के भीतर के किसी प्रश्‍न का अवधारण आता है । 

‘डिक्रीदार’ से कोई ऐसा व्‍यक्ति अभिप्रेत है जिसके पक्ष में कोई डिक्री पारित की है या कोई निष्‍पादन-योग्‍य आदेश किया गया है। 

‘जिला’ से आरम्भिक अधिकारिता वाले प्रधान सिविल न्‍यायालय की (जिसे इसमें इसके पश्‍चात् ‘जिला न्‍यायालय’ कहा गया है) अधिकारिता की स्‍थानीय सीमांए अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत उच्‍च न्‍यायालय की मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता की स्‍थानीय सीमाएं आती हैं। 

‘सरकारी प्‍लीडर’ के अंतर्गत ऐसा कोई अधिकारी आता है जो सरकारी प्‍लीडर पर इस संहिता द्वारा अभिव्‍यक्‍त रूप से अधिरोपित कृत्‍यों का या उनमें से किन्‍हीं का पालन करने के लिए राज्‍य सरकार द्वारा नियुक्‍त किया गया है और ऐसा कोई प्‍लीडर भी आता है जो सरकार प्‍लीडर के निदेशों के अधीन कार्य करता है। 

‘निर्णय’ से न्‍यायाधीश द्वारा डिक्री या आदेश के आधारों का कथन अभिप्रेत है 

‘निर्णीत ऋणी’ से वह व्‍यक्ति अभिप्रेत है जिसके विरुद्ध कोई डिक्री पारित की गई है या निष्‍पादन-योग्‍य कोई आदेश किया गया है। 

‘विधिक प्रतिनिधि’ से वह व्‍यक्ति अभिप्रत है जो मृत व्‍यक्ति की सम्‍पदा का विधि की दृष्टि से प्रतिनिधित्‍व करता है और उसके अंतर्गत कोई ऐसा व्‍यक्ति आता है जो मृतक की सम्‍पदा में दखलंदाजी करता है और जहां कोई पक्षकार प्रतिनिधि रूप में वाद लाता है या जहां किसी पक्षकार पर प्रतिनिधि रूप में वाद लाया जाता है वहा वह व्‍यक्ति इसके अंतर्गत आता है जिसे वह सम्‍पदा उस पक्षकार के मरने पर न्‍यागत होती है जो इस प्रकार वाद लाया है या जिस पर इस प्रकार वाद लाया गया है।


(Word Count - 462)