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Monday, 26 March 2018

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (भाग - 6)


राष्‍ट्रपति के अध्‍यादेश के पश्‍चात् लोक सभा में पुन: मानवाधिकार संरक्षण विधेयक, 1993 लाया गया । अन्‍तत: यह विधेयक संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित कर दिया गया । इस प्रकार मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 पारित हुआ । इस अधिनियम के पारित हो जाने पर राष्‍ट्रपति का अध्‍यादेश निरस्त हो गया । 

यहाँ संक्षेप में संसद की विधयी प्रक्रिया का उल्‍लेख करना भी समीचीन होगा । संविधान के अनुच्‍छेद 107, 108 एवं 111 में सामान्‍य विधि निर्माण की प्रक्रिया बताई गई है । इनका मूल पाठ इस प्रकार है – 

अनुच्‍छेद 107 : विधेयकों के पुन: स्‍थापना और पारित किये जाने के संबंध में उपबंध – 

(1) धन विधेयकों और अन्‍य वित्‍त विधेयकों के संबंध में अनुच्‍छेद 109 और अनुच्‍छेद 117 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई विधेयक संसद के किसी भी सदन में आरंभ हो सकेगा । 

(2) अनुच्‍छेद 108 और अनुच्‍छेद 109 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई विधेयक संसद के सदनों द्वारा तब तक पारित किया गया नहीं समझा जाएगा जब तक संशोधन के बिना या केवल ऐसे संशोधनों सहित, जिन पर दोनों सदन सहमत हो गए हैं, उस पर दोनों सदन सहमत नहीं हो जाते हैं । 

(3) संसद में लंबित विधेयक सदनों के सत्रावसान के कारण व्‍यपगत नहीं होगा । 

(4) राज्‍य सभा में लंबित विधेयक, जिसकों लोक सभा ने पारित नहीं किया है, लोक सभा में विघटन पर व्‍यपगत नहीं होगा । 

(5) कोई विधेयक, जो लोक सभा में लंबित है या जो लोक सभा द्वारा पारित कर दिया गया है और राज्‍य सभा में लंबित है, अनुच्‍छेद 108 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, लोक सभा के विघटन पर व्‍यपगत हो जाएगा । 

अनुच्‍देद 108 : कुछ दशाओं में दोनों सदनों की संयुक्‍त बैठक – 

(1) दूसरे सदन द्वारा विधेयक अस्‍वीकार कर दिया गया है; या 

(2) विधेयक में किए जाने वाले संशोधनों के बारे में दोनों सदन अंतिम रूप से असहमत हो गए हैं; या 

(3) दूसरे सदन को विधेयक प्राप्‍त होने की तारीख से उसके द्वारा विधेयक पारित किए बिना छह मास से अधिक बीत गए हैं; 

तो उस दशा के सिवाय जिसमें लोक सभा का विघटन होने के कारण विधेयक व्‍यपगत हो गया है, राष्‍ट्रपति विधेयक पर विचार-विमर्श करने और मत देने के प्रयोजन के लिए सदनों को संयुक्‍त बैठक में अधिवेशित होने के लिए आहूत करने के अपने आशय की सूचना, यदि बैठक में हैं तो संदेश द्वारा या यदि वे बैठक में नहीं है तो लोक अधिसूचना द्वारा देगा: 

परंतु इस खंड की कोई बात धन विधेयक को लागू नहीं होगी । 

छह मास की ऐसी अवधि की गणना करने में, जो खंड (1) में निर्दिष्‍ट है, किसी ऐसी अवधि को हिसाब में नहीं लिया जाएगा जिसमें उक्‍त खंड के उपखंड (ग) में निर्दिष्‍ट सदन सत्रावसित या निरंतर चार से अधिक दिनों के लिए स्‍थगित कर दिया जाता है।

(Word Count - 448)

Thursday, 22 March 2018

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (भाग - 5)


मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम : 

अब हम मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के उपबंधों पर विचार करते हैं । 

अधिनियम का नाम, विस्‍तार एवं प्रवर्तन : 

इस अधिनियम का नाम ‘मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993’ के नाम से सम्‍बोधित किया गया है । 

इसका विस्‍तार सम्‍पूर्ण भारत पर है । परंतु जहाँ तक जम्‍मू और कश्‍मीर का प्रश्‍न है, यह अधिनियम वहां संविधान की सातवी अनुसूची की सूची 1 अथवा सूची 3 में वर्णि विषयों से संबंध में ही लागू होगा । 

इस अधिनियम को 28 सितम्‍बर, 1993 से लागू किया गया है । (धारा 1) 28 सितम्‍बर, 1993 वह तिथि है जिस दिन राष्‍ट्रपति द्वारा मानवाधिकार संरक्षण अध्‍यादेश जारी किया गया था । 

यह अधिनियम सन् 1994 का अधिनियम संख्‍या 10 है तथा उसे राष्‍ट्रपति की अनुमति दिनांक 8 जनवरी, 1994 को प्राप्‍त हुई । 

अधिनियम के आरम्‍भ में ही इसका उद्देश्‍य बताया गया है । इस अधिनियम के मुख्‍यतया निम्नांकित उद्देश्‍य हैं – 

(1) मानव अधिकारों का बेहतर संरक्षण; 

(2) राष्‍ट्रीय मानवाधिकार संरक्षण आयोग का गठन; एवं 

(3) राज्‍यों में राज्‍य मानवाधिकार संरक्षण आयोगों की स्‍थापना । 

इन्‍हीं उद्देश्‍यों को मूर्त रूप प्रदान करने के लिए भारतीय गणराज्‍य के 44 वें वर्ष में संसद द्वारा यह अधिनियम पारित किया गया । 

सन् 1993 में ही राष्‍ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्‍छेद 123 के अंतर्गत मानवाधिकार संरक्षण अध्‍यादेश जारी किया गया जिसका मुख्‍य उद्देश्‍य राष्‍ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा राज्‍यों में राज्‍य मानवाधिकार आयोग का गठन करना था । 

यहाँ यह उल्‍लेखनीय है कि जब संसद का अधिवेशन नहीं चल रहा हो और परिस्थ्‍िातियां ऐसी हों कि उनसे निपटने के लिए कानून की आवश्‍यकता हो; 

तब राष्‍ट्रपति संविधान के अनुच्‍छेद 123 के अंतर्गत अध्‍यादेश जारी कर सकता है और उस अध्‍यादेश का वही प्रभाव होता है जो किसी अधिनियम का होता है । यहां संविधान के अनुच्‍छेद 123 का मूल पाठ निम्‍नलिखित है : 

संसद के विश्रांतिकाल में अध्‍यादेश प्रख्‍यापित करने की राष्‍ट्रपति की शक्ति –
(1) उस समय को छोड़कर जब संसद के दोनों सदन सत्र में है, यदि किसी समय राष्‍ट्रति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी परिस्थितयां विद्यमान है जिनके कारण तुरंत कार्रवाई करना उसके लिए आवश्‍यक हो गया है तो वह ऐसे अध्‍यादेश प्रख्‍यापित कर सकेगा जो उसे परिस्थितियों में अपेक्षित प्रतीत हों । 

(2) इस अनुच्‍छेद के अधीन प्रख्‍यापित अध्‍यादेश का वही बल और प्रभाव होगा जो संसद के अधिनियम का होता है, किंतु प्रत्‍येक ऐसा अध्‍यादेश – 
          (2.1) संसद के दोनों सदनों में समक्ष रखा जाएगा और संसद के पुन: समवेत होने से छह सप्‍ताह की समाप्ति पर या यदि उस अवधि की समाप्ति से पहले दोनों सदन उसके अनुमोदन का संकल्‍प पारित कर देते हैं तो, इनमें से दूसरे संकल्‍प के पारित होने पर प्रवर्तन में नहीं रहेगा; और 
          (2.2) राष्‍ट्रपति द्वारा किसी भी समय वापस लिया जा सकेगा । 

(3) यदि और जहाँ तक इस अनुच्‍छेद के अधीन अध्‍यादेश कोई ऐसा उपबंध करता है जिसे अधिनियमत करने के लिए संसद इस संविधान के अधीन सक्षम नहीं है तो और वहां तक वह अध्‍यादेश शून्‍य होगा ।

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Saturday, 17 March 2018

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (भाग - 4)

अन्‍तर्राष्‍ट्रीय प्रसंविदायें : 

मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिये सन् 1966 में दो प्रसंविदायें की गईं जिन्‍हें ‘नागरिकों तथा राजनैतिक अधिकारों की अन्‍तर्राष्‍ट्रीय प्रसंविदा’ एवं ‘आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्‍कृतिक अधिकारों की प्रसंविदा’ के नाम से जाना जाता है । यह दोनों प्रसंविदायें अन्‍तर्राष्‍ट्रीय मानवाधिकार बिल के भाग हैं । 

नागरिक तथा राजनैतिक अधिकारों की प्रसंविदा में जिन अधिकारों का उल्‍लेख किया गया है उनमें प्रमुख हैं – 

          (1) जीवन, सुरक्षा एवं स्‍वतंत्रता का अधिकार; 
          (2) विचार एवं अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार; 
          (3) विधि के समक्ष समानता का अधिकार; 
          (4) बलात श्रम एवं दासता से मुक्ति का अधिकार; आद‍ि । 

जबकि अर्थिक, सामाजिक एवं सांस्‍कृतिक अधिकारों की प्रसंविदा में वर्णित अधिकारों में – 

          (1) स्‍वतंत्रता का अधिकार;
          (2) जीवन एवं समुचित जीवन यापन का अधिकार;
          (3) काम की न्‍यायोचित दशाएं;
          (4) शिक्षा, चिकित्‍सा एवं स्‍वास्‍थ्‍य का अधिकार;
आदि प्रमुख हैं । 

इन प्रसंविदाओं में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की महासभा द्वारा दिनांक 16 सितम्‍बर, 1966 को अंगीकृत किया गया तथा सदस्‍य राष्‍ट्रों का व्‍यापक समर्थन मिला । मानवाधिकारों की क्रियान्विति की दिशा में इन प्रसंविदाओं को महान उपलब्धि माना जाता है । 

गृह मंत्रालय की अधिसूचना संख्‍या एस. ओ. 2397 (ई), दिनांक 18 सितम्‍बर, 2009 द्वारा संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की महासभा द्वारा अंगीकृत निम्‍नांकित अभिसमयों को केंद्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्‍ट किया गया है – 

          (1) महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के विभेदों को समाप्‍त करने पर अभिसमय; तथा 
          (2) बाल अधिकारों पर अभिसमय । 

यूरोपीय संधि : 

मानवाधिकारों को विधिक स्‍वरूप प्रदान करने तथा व्‍यवहार में इन्‍हें प्रभावी रूप से लागू करने के लिये सन् 1950 में यूरोपीय देशों द्वारा की गई संधि का भी अपना अनूठा स्‍थान है । इस संधि के अंतर्गत यूरोपीय देशों की परिषद् द्वारा एक कमीशन तथा न्‍यायालय की स्‍थापना की गई । कमीशन का कार्य मानवाधिकारों के उल्‍लंघन विषयक मामलों की जांच करना तथा न्‍यायालय का कार्य उस पर निर्णय देना है । मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा को कार्यान्वित करने का यह एक महत्‍वपूर्ण प्रयास है ।

मानवाधिकार कोष :

मानवाधिकारों के क्रियान्‍वयन की दिशा में मानवाधिकार कोष की स्‍थापना का उल्‍लेख किया जाना प्रासंगिक होगा । 18 दिसम्‍बर, 1991 को संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की महासभा द्वारा एक स्‍वैच्छिक मानवाधिकार न्‍यास कोष की स्‍थाना की घोषणा की गई । इस कोष में प्राप्‍त धनराशि का उपयोग गुलामी और दासता में पल रहे मानव समुदाय को उत्‍पीड़न से मुक्ति दिलाने तथा उन्‍हें समुचित संरक्षण प्रदान करने के लिये किया जाता है । 

(Word Count - 385)

Friday, 16 March 2018

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (भाग - 3)


संयुक्‍त राष्‍ट्र चार्टर : 

संयुक्‍त राष्‍ट्र चार्टर को मानवाधिकारों का प्रथम अन्‍तर्राष्‍ट्रीय दस्‍तावेज कहा जा सकता है। इस चार्टर में मानवाधिकारों को महत्‍वपूर्ण स्‍थान दिया गया है। चार्टर की प्रस्‍तावना में ही मानवाधिकारों के प्रति अटूट विश्‍वास व्‍यक्‍त किया गया है। चार्टर के अनुच्‍छेद 1(3) में इसके उद्देश्‍यों पर पर प्रकाश डालते हुए कहा गया है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ का यह लक्ष्‍य है कि वह मानवाधिकारों तथा मूलभूत स्‍वतंत्रतओं को बिना किसी जाति, भाषा, लिंग अथवा धर्म विषयक भेदभाव के प्रोत्‍साहित करे। चार्टर के अनुच्‍छेद 55 में यह व्‍यवस्‍था की गई है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ मानव उत्‍थन की ओर अग्रसर होने के लिये जाति, लिंग, धर्म भाषा आदि के आधार पर भेदभाव किये बिना मानवाधिकारों तथा मूलभूत स्‍वतंत्रओं का आदर तथा उनका पालन सुनिश्चित करें। अनुच्‍छेद 56 में संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के सदस्‍य राष्‍ट्रों द्वारा उपरोक्‍त उद्देश्‍य को मूर्तरूप प्रदान करने की दिशा में पारित संकल्‍प निहित है। मानवाधिकारों की प्रभावी क्रियान्विती सुनिश्चित करने के लिये चार्टर में आर्थिक तथा सामाजिक परिषद को विपुल अधिकार प्रदान किये गए हैं। चार्टर में प्रन्‍यासी प्रणाली पर भी यह दायिव्‍त अधिरोपित किया गया है कि वह मानवाधिकारों को प्रन्‍यासी क्षेत्रों में लागू करने का हर संभव प्रयास करे। 

मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा : 

न्‍यायाधीश लाटरपेट ने मत में मानवाधिकारों की सार्वभौमिक घोषणा, 1948 विश्‍व की एक महानतम घटना तथा संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की एक महत्‍वपूर्ण उपलब्धि है। सन् 1945 में जब संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की स्‍थाना हुई तब उसका एक चार्टर तैयार किया गया था। इस चार्टर के अनुच्‍छेद 68 में मानवाधिकारों के सरंखण के लिये प्रारूप तैयार करने हेतु सन् 1946 में एलोनोर रूजवेल्‍ट की अध्‍यक्षता में एक मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया । आयोग ने जून 1948 में मानवाधिकार की एक विश्‍वव्‍यापी घोषणा का प्रारूप तैयार किया जिसे संयुक्‍त्‍ राष्‍ट्र संघ की महासभा द्वारा 10 दिसम्‍बर को अंगीकृत किया गया। यही कारण है कि 10 दिसम्‍बर को सम्‍पूर्ण विश्‍व ‘मानवाधिकार दिवस’ के रूप में मनाता है। मानवाधिकार घोषणा पत्र में उन सभी बिन्‍दुओं को समाहित किया गया है जो गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिये आवश्‍यक है। इस घोषणा पत्र में कुद 30 अनुच्‍छेद हैं । इसके अनुसार – 

1) सभी मनुष्‍य स्‍वतंत्र रूप से जनम लेते हैं तथ प्रतिष्‍ठा एवं अधिकारों की दृष्टि से समान है। 

2) प्रत्‍येक व्‍यक्ति की जीवन, स्‍वतंत्रता तथा सुरक्षा का अधिकार है। 

3) किसी भी व्‍यक्ति को दास अथव गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकेगा। 

4) किसी भी व्‍यक्ति के साथ न तो अमानवीय व्‍यवहार किया जायेगा और न उसे क्रूरतम दंड दिया जायेगा। 

5) विधि के समक्ष सभी व्‍यक्ति समान होंगे। 

6) सभी व्‍यक्तियों को शांतिपूर्वक सम्‍मेलन करने, भ्रमण करने तथा व्‍यापार-व्‍यवसाय करने की स्‍वतंत्रता होगी। 

7) प्रत्‍येक व्‍यक्ति को शारीरिक, मानसिक एवं बौद्धिक विकास के समान अवसर उपलब्‍ध होंगे। 

8) सभी व्‍यक्तियों को शिक्षा प्राप्‍त करने का अधिकार होगा तथा प्रारंभिक शिक्षा नि:शुल्‍क एवं अनिवार्य होगी। 

9) प्रत्‍येक व्‍यक्ति को सम्‍पत्ति रखने का तथा से व्‍ययन का अधिकार होगा। 

10) अभियुक्‍त को तब तक निर्दोष माना जायेगा जब तक कि उसके विरुद्ध दोषसिद्धि का आदेश पारित न हो जाये। 

11) प्रत्‍येक व्‍यक्ति को सुनवाई का अवसर प्रदान किया जायेगा । 

12) किसी भी व्‍यक्ति को मनमाने तौर पर गिरफ्तार नहीं किया जायेगा और न बंदी बनाया जायेगा । 

13) सभी वयसक पुरुष एवं स्त्रियों को विवाह करने तथा कुटुम्‍ब बसाने का अधिकार होगा । 

14) सभी को समान कार्य के लिये समान वेतन दिया जायेगा । 

इस प्रकार घोषणा पत्र में विहित उपरोक्‍त सभी अधिकार वे ही हैं जो भारत में संविधान के भाग तीन एवं चार में मूल अधिकारों एवं राज्‍य की नीति के निदेशक तत्‍वों के रूप में समाहित किये गये हैं।

(Word Count - 586)

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (भाग - 2)


मानवाधिकारों का अन्‍तर्राष्‍ट्रीय घोषणा पत्र – 

           मानवाधिकारों के वट वृक्ष की जड़ें अतीत की गहराइयों में छिपी हैं। इनके इतिहास की कहानी मानव सभ्‍यता के अभ्‍युदय एवं विकास से जुड़ी हुई है। यद्यपि अन्‍तर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर मानवाधिकारों की स्‍थापना का प्रथम दस्‍तावेज संयुक्‍त राष्‍ट्र चार्टर को माना जाता है लेकिन मूल अधिकारों के रूप में इसका श्रेय 1215 के मेग्‍नाकार्टा को जाता है। मेग्‍नाकार्टा से प्रवाहित मानवाधिकारों की गंगा आज अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में प्रवाहित हो रही है। 

मेग्‍नाकार्टा :- 

          मूल अधिकारों के रूप में मानवाधिकारों की स्‍थापना का प्रथम दस्‍तावेज इंग्‍लैंड का सन् 1215 का मेग्‍नाकार्टा माना जाता है। यह इंग्‍लैंडवासियों को सम्राट जॉन का एक महत्‍वपूर्ण उपहार था। इसे मूल अधिकारों का जनक भी कहा जाता है। यही वह अधिकार पत्र था जिसके द्वारा इंग्‍लैंड में विधि के शासन को मूर्त रूप प्रदान किया गया था। विधिक प्रत्‍यय ‘समुचित प्रक्रिया’ की उपज मेग्‍नाकार्टा की ही देन है। प्रथम बार मेग्‍नाकार्टा के अनुच्‍छेद 39 में यह व्‍यवस्‍था की गई कि – ‘किसी भी व्‍यक्ति को विधिपूर्ण न्‍याय निर्णयन अथवा देश की विधि से अन्‍यथा रूप से न तो बंदी बनाया जायेगा और न ही बेदखल, निर्वासित, विधि बाध्‍य अथवा विनिष्‍ट ही किया जायेगा। ‘इस प्रकार इस व्‍यवस्‍था द्वारा कार्यपालिका की निरंकुश शक्तियों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। 

बिल ऑफ राइट्स – 

         मेग्‍नाकार्टा में विहित अधिकारों में देश, काल और परिस्थितियों के अनुसार अभिवृद्धि होती गई और कालान्‍तर में सन् 1689 में ‘बिल ऑफ राइट्स’ नामक दस्‍तावेज की संरचना की गई। इस दस्‍तावेज में नागरिकों के कई महत्‍वपूर्ण अधिकारों एवं स्‍वतंत्रताओं को समाहित किया गया। बिल ऑफ राइट्स का लाभ अमेरिका की जनता ने भरपूर उठाया। उसने अमेरिका के संविधान में इन अधिकारों को समाविष्‍ट करने की मांग की। परिणामस्‍वरूप अमेरिका के संविधान में पांचवे एवं छठे संशोधनों द्वारा इन अधिकारों को स्‍थान दिया गया और यह व्‍यवस्‍था की गई कि – ‘किसी भी व्‍यक्ति को सम्‍यक् विधिक प्रक्रिया के बिना जीवन, स्‍वतंत्रता एवं संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा। ‘स्‍वतंत्रता के भाषण, प्रेम, धर्म, सभा, निवास, विचरण, व्‍यापार, वृत्ति, कारोबार आदि की स्‍वतंत्रतओं को सम्मिलित किया गया। ‘हर्टडो बनाम केलिफोर्निया’ के मामले में यह कहा गया कि – ‘विधायिका ऐसी कोई विधि नहीं बना सकेगी जो न्‍याय और स्‍वतंत्रता के मूलभूत सिद्धान्‍तों पर कुठाराघात करती हो। 

फ्रांस का घोषणा पत्र – 

          फ्रांस में मानवाधिकारों के रूप में मूल अधिकारों की घोषणा सन् 1789 में की गई। जिस दस्‍तावेज द्वारा यह घोषणा की गई वह ‘मानव सिविल अधिकारों को घोषणा पत्र’ कहा जाता है। संक्षेप में इसे ‘मानव अधिकार घोषणा पत्र’ भी कहा जा सकता है। इसमें समाविष्‍ट अधिकारों को मनुष्‍य के पवित्र अधिकारों की संज्ञा दी गई है। यह अधिकार प्राकृतिक एवं असंक्रमणीय है।

(Word Count - 429)

मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम (भाग - 1)


           भारतीय संविधान के भाग तीन में वर्णित मूल अधिकारों को इंग्‍लैण्‍ड के मेग्‍नाकार्टा, अमेरिका के बिल ऑफ राइट्स तथा फ्रांस के मानव अधिकार घोषणा पत्र की संज्ञा दी जाती है। गोलकनाथ बनाम स्‍टेट ऑफ पंजाब के मामले में उच्‍च्‍तम न्‍यायालय ने इन अधिकारों को व्‍यक्ति के बौद्धिक, नैतिक एवं आध्‍यात्मिक विकास के लिए आवश्‍यक माना है। मेनका गांधी बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के मामले में भी उक्‍त मत की पुष्टि करते हुए इन मूल अधिकारों में व्‍यक्ति के सम्‍मान के संरक्षण और व्‍यक्तित्‍व के विकास की परिकल्‍पना की है। इसी मामले में न्‍यायमूर्ति पी० एन० भगवती ने कहा है कि इन मूल अधिकारों का उद्भम स्‍वतंत्रता का संघर्ष है। संविधान में इन्‍हें स्‍थान देने के पीछे मुख्‍य उद्देश्‍य भारत में स्‍वाधीनता का वट वृक्ष विकसित करना रहा है। देश, काल और परिस्‍थतियों के अनुसार इन मूल अधिकारों की परिभाषायें बदलती रही हैं और प्रवर्तन के नये-नये उपाय निकलते रहे हैं। ए० के० गोपालन बनाम स्‍टेट ऑफ मद्रास के मामले में इनकी विधानमंडलों द्वारा अतिक्रमण से सुरक्षा की गई तो केशवनन्‍द भारती बनाम स्‍टेट ऑफ केरल के मामले में इनकों संविधान का मूल ढांचा मानते हुए नष्‍ट होने से बचा लिया गया।

           धीरे-धीरे ये मूल अधिकार मानव अधिकार के रूप में प्रख्‍यात होने लगे। हमारे न्‍यायालयों ने भी इन मूल अधिकारों को मानव अधिकारों के दायरे में ला दिया। जब मानवीय मूल्‍यों का ह्यास एवं मानव अधिकारों का अतिलंघन होने लगा तो न्‍यायालयों ने नई-नई व्‍यवस्‍थायें देकर इन्‍हें पुनर्स्‍थापित करने का प्रयास किया। जेलों में कैदियों के प्रति किये जाने वाले अमानवीय एवं क्रूर व्‍यवहार पर प्रहार करते हुए सुनील बत्रा बनाम दिल्‍ली प्रशासन के मामले में न्‍यायमूर्ति कृष्‍णा अय्यर ने मानव अधिकारों को विधिशास्त्र एवं संविधान का अभिन्न अंग बताते हुए इन्‍हें संरक्षण प्रदान किया। प्रेम शंकर बनाम दिल्‍ली प्रशासन के मामले में तो यहां तक कह दिया गया कि मानव अधिकार संबंधी उपबंधों का निर्वचन करते समय संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ के मानव अधिकार घोषणा पत्र में निहित मूल सिद्धान्‍तों को ध्‍यान रखना चाहिए जो जेल, जेलकर्मियों और बंदियों में सुधार का आव्‍हान करता है। सभ्‍य समाज में मानव अधिकारों का मूल्‍य इतना बढ़ता चला गया कि इनके संरक्षण के लिए संसद द्वारा मानवाधिकार संरक्षण अधिनिमय, 1993 ही पारित कर दिया गया। यह अधिनियम मानव अधिकारों के संरक्षण की दिशा में मील का पत्‍थर है। 

           अब तो मानवाधिकारों का दयरा इतना बढ़ गया है कि उच्‍चतम न्‍यायालय में मनोहरलाल बनाम दिनेश आनन्‍द के मामले में यहां तक कह दिया है कि समाज की सुरक्षा के लिए अपराधियों को अभियोजित करना एक सामाजिक आवश्‍यकता है। इसके लिए अधिकारिता की अवधारणा (Concept of Locus Standi) अर्थहीन है। ऐसे मामलों में यह अवधारणा लागू नहीं होती।

          मानवाधिकार को दृष्टिगत रखते हुए ही सुचित्रा श्रीवास्‍तव बनाम चण्‍डीगढ़ एडमिनिस्‍ट्रेशन के मामले में उच्‍चतम न्‍यायालय द्वारा कहा गया है कि – 

           “A woman’s right to privacy, dignity and bodily integrity should be respected.”

           अर्थात् प्रत्‍येक महिला के एकान्‍तता, गरिमा एवं शरीरिक सौष्‍ठक के अधिकार का सम्‍मान किया जाना चाहिए ।

(Word Count - 482)